भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 619

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१५


| रोहितादिरूपविवेककरणादपागादिति युक्तम्; यथा तन्त्वपकर्षणे पटाभावः । <br><br> नैवं बुद्धिशब्दमात्रमेव ह्यग्नियत आह वाचारम्भणमग्निर्नाम विकारो नामधेयं नाममात्रमित्यर्थः । अतोऽग्निबुद्धिरपि मृषैव किंतर्हि तत्र सत्यम् ! त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्, नाणुमात्रमपि रूपत्रयव्यतिरेकेण सत्यमस्तीत्यवधारणार्थः ॥ १ ॥ | अग्निका अग्नित्व रोहितादि रूपोंका विवेक करनेसे निवृत्त हो गया—इतना ही कहना उचित है, जिस प्रकार कि तन्तुओंको निकाल लेनेपर पटका अभाव हो जाता है । <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अग्नि तो अग्निबुद्धि और अग्निशब्दमात्र ही है, कारण श्रुति कहती है 'अग्निरूप जो विकार है वह वाणीपर अवलम्बित नामधेय अर्थात् नाममात्र ही है।' इसलिये अग्निबुद्धि भी मिथ्या ही है । तो फिर उसमें सत्य क्या है ? बस, तीन रूप ही सत्य है—यह कथन इस बातको निश्चित करनेके लिये है कि तीन रूपोंके अतिरिक्त और कुछ अणुमात्र भी सत्य नहीं है ॥ १॥ | | तथा— | इसी प्रकार— |

—:०:—

यदादित्यस्य रोहितँ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥२॥ यच्चन्द्रमसो रोहितँ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाच्चन्द्राच्चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥३॥