छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 624, कुल 978 में से
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| ६२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
|---|
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतद्धिद्वांसो विदितवन्तः पूर्वेऽतिक्रान्ता महाशाला महाश्रोत्रिया आहुर्ह स्म वै किल। किमुक्तवन्तः? इत्याह—न नोऽस्माकं कुलेऽद्येदानीं यथोक्तविज्ञानवतां कश्चन कश्चिदप्यश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यति नोदाहरिष्यति, सर्वं विज्ञातमेवास्मत्कुलीनानां सद्विज्ञानवत्त्वादित्यभिप्रायः।<br><br>ते पुनः कथं सर्वं विज्ञातवन्तः? इत्याह—एभ्यस्त्रिभ्यो रोहितादिरूपेभ्यस्त्रिवृत्कृतेभ्यो विज्ञातेभ्यः सर्वमप्यन्यच्छिष्टमेवमेवेति विदाञ्चक्रुर्विज्ञातवन्तो यस्मात्तस्मात्सर्वज्ञा एव सद्विज्ञानात्त आसुरित्यर्थः। अथवैभ्यो विदाञ्चक्रुरित्यग्न्यादिभ्यो दृष्टान्तेभ्यो विज्ञातेभ्यः सर्वमन्यद्विदाञ्चक्रुरित्येतत् ॥ ५ ॥ | इस (त्रिवृत्करण) को जाननेवाले पूर्ववर्ती अर्थात् अतीतकालीन महागृहस्थ और महाश्रोत्रियोंने कहा था। क्या कहा था? सो बतलाते हैं—'उपर्युक्त विज्ञानको जाननेवाले हमलोगोंके कुलमें आज-इस समय कुछ भी अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात हो, ऐसा कोई भी नहीं बता सकेगा। तात्पर्य यह है कि सत्के विज्ञानसे युक्त होनेके कारण हमारे कुटुम्बियोंको सब कुछ ज्ञान ही है।'<br><br>किंतु उन्होंने किस प्रकार सब कुछ जाना है, सो श्रुति बतलाती है—'क्योंकि इन तीन अर्थात् [इस प्रकार] जाने हुए त्रिवृत्कृत रोहितादि रूपोंद्वारा, अन्य अवशिष्ट पदार्थ भी ऐसे ही हैं—इस प्रकार वे जानते हैं, अतः सत्के विज्ञानके कारण वे सब सर्वज्ञ ही हो गये हैं'—ऐसा इसका तात्पर्य है। अथवा 'एभ्यः विदाञ्चक्रुः' इसका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि विज्ञात हुए इन अग्नि आदि दृष्टान्तोंद्वारा वे और सबको भी जान गये हैं ॥ ५ ॥ |
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