छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 625, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२१
| कथम् ? | किस प्रकार जान गये हैं ? |
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यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपाᳪरूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुः ॥ ६ ॥
यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानाᳪसमास इति तद्विदाञ्चकुर्यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥
जो कुछ रोहित-सा है वह तेजका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है; जो शुक्ल-सा है वह जलका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है तथा जो कृष्ण-सा है वह अन्नका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है ॥ ६ ॥
तथा जो कुछ विज्ञात-सा है वह इन देवताओंका ही समुदाय है—ऐसा उन्होंने जाना है। हे सोम्य ! अब तू मेरेद्वारा यह जान कि किस प्रकार ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाता है ॥ ७ ॥
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| यदन्यरूपेण संदिह्यमाने कपोतादिरूपे रोहितमिव यद्गृह्यमाणमभूत्तेषां पूर्वेषां ब्रह्मविदाम्, <br><br> तत्तेजसो रूपमिति विदाञ्चक्रुः। <br><br> तथा यच्छुक्लमिवाभूद्गृह्यमाणं तदपां रूपम्, यत्कृष्णमिवगृह्यमाणं तदन्नस्येति विदाञ्चक्रुः। एवमेवा- | [अग्नि आदिकी अपेक्षा] अन्य रूपसे संदेह किये जाते हुए कपोतादिरूपमें जो उन पूर्ववर्ती ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा रोहित-सा ग्रहण किया जाता था वह तेजका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना। तथा जो शुक्ल-सा ग्रहण किया जाता था वह जलका रूप है और जो कृष्ण-सा ग्रहण किया जाता था वह अन्नका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना। इसी प्रकार जो अत्यन्त |