छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 647, कुल 978 में से
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| मिति पुण्यापुण्यकार्यम्। पुण्यापुण्ययोर्हि सुखदुःखारम्भकत्वं प्रसिद्धम्। पुण्यापुण्ययोश्चाविद्याकामोपष्टम्भेनैव सुखदुःखतद्दर्शनकार्यारम्भकत्वमुपपद्यते नान्यथेत्यविद्याकामकर्मभिः संसारहेतुभिः संयुक्त एव स्वप्न इति न स्वमपीतो भवति “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य भवति” (बृ० उ० ४।३।२२) “तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दाः” (बृ० उ० ४।३।२१) “एष परम आनन्दः” (बृ० उ० ४।३।३३) इत्यादिश्रुतिभ्यः। सुषुप्त एव स्वं देवतारूपं जीवत्वविनिर्मुक्तं दर्शयिष्यामीत्याह— स्वप्नान्तं मे मम निगदतो हे सोम्य विजानीहि विस्पष्टमवधारयेत्यर्थः। | है; इसलिये वह पुण्य-पापका कार्य है, क्योंकि पुण्य-पाप ही क्रमशः सुख-दुःखके आरम्भक रूपमें प्रसिद्ध हैं। किंतु पुण्य-पापका जो सुख, दुःख और उनके दर्शनरूप कार्यका आरम्भकत्व है वह अविद्या और कामनाके आश्रयसे ही सम्भव है, और किसी प्रकार नहीं, इसलिये स्वप्न संसारके हेतुभूत अविद्या, कामना और कर्म इनसे संयुक्त ही है; अतः उस अवस्थामें जीव अपने स्वरूपको प्राप्त नहीं होता; जैसा कि “[ उस अवस्थामें ] वह पुण्यसे असम्बद्ध, पापसे असम्बद्ध तथा हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार किये होता है” “इसका वह यह रूप अतिच्छन्दा (काम, धर्माधर्म तथा अविद्यासे रहित) है” “यह परम आनन्द है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। अतः 'मैं सुषुप्तिमें ही जीवभावसे रहित अपने देवतारूपको दिखलाऊँगा' ऐसा आरुणिने कहा। हे सोम्य! मेरे कथन करनेसे तू स्वप्नान्त (सुषुप्तावस्था) को विशेषरूपसे जान ले अर्थात् स्पष्टतया समझ ले। |
छा० उ० २१—