छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 658, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तनं यासां ताः सदायतनाः प्रजाः, अन्ते च सत्प्रतिष्ठाः सदेव प्रतिष्ठा लयः समाप्तिरवसानं परिशेषो यासां ताः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ | जिस प्रजाका सत् ही आयतन (आश्रय) है वह प्रजा सदायतना है तथा अन्तमें सत्प्रतिष्ठा है—सत् ही जिसकी प्रतिष्ठा—लयस्थान—समाप्ति—अवसान अर्थात् परिशेष है ऐसी वह प्रजा सत्प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥ |
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अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितꣳसोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥
अब; जिस समय यह पुरुष ‘पिपासति’ (पीना चाहता है) ऐसे नामवाला होता है तो उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है। अतः जिस प्रकार गोनाय, अश्वनाय एवं पुरुषनाय कहलाते हैं उसी प्रकार उस तेजको ‘उदन्या’ ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य! उस (जलरूप मूल) से यह शरीररूप अङ्कुर उत्पन्न हुआ है—ऐसा जान, क्योंकि यह मूलरहित नहीं हो सकता ॥ ५ ॥
| यथेदानीमप्शृङ्गद्वारेण सतो मूलस्यानुगमः कार्य इत्याह-यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम पिपासति पातुमिच्छतीति पुरुषो भवति। अशिशिषतीतिवदिदमपि गौणमेव नाम भवति। द्रवीकृतस्याशितस्यान्नस्य नेत्र्य आपो- | अब—इस समय जलरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलका ज्ञान कराना है, इस अभिप्रायसे आरुणि कहता है—‘जिस समय यह पुरुष ‘पिपासति’—पीना चाहता है ऐसे नामवाला होता है। ‘अशिशिषति’ इस नामके समान यह भी उसका गौण नाम ही है। भक्षण किये हुए द्रवीकृत अन्नको ले जानेवाला |