भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 668, कुल 978 में से

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पृष्ठ 668
६६४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

ते तथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति ॥ २ ॥

वे रस जिस प्रकार उस मधुमें इस प्रकारका विवेक प्राप्त नहीं कर सकते कि 'मैं इस वृक्षका रस हूँ और मैं इस वृक्षका रस हूँ' हे सोम्य! ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजा सत्‌को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्‌को प्राप्त हो गये ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
ते रसा यथा मधुत्वेनैकतां गतास्तत्र मधुनि विवेकं न लभन्ते। कथममुष्याहमाम्रस्य पनसस्य वा वृक्षस्य रसोऽस्मीति यथा हि लोके बहूनां चेतनावतां समेतानां प्राणिनां विवेकलाभो भवत्यमुष्याहं पुत्रोऽमुष्याहं नप्तास्मीति। ते च लब्धविवेकाः सन्तो न संकीर्यन्ते न तथेहानेकप्रकारवृक्षरसानामपि मधुराम्लतिक्तकटुकादीनां मधुत्वेनैकतां गतानां मधुरादिभावेन विवेको गृह्यत इत्यभिप्रायः।मधुरूपसे एकताको प्राप्त हुए वे रस जिस प्रकार उस मधुमें [ इस प्रकारका ] विवेक प्राप्त नहीं करते—किस प्रकारका ?—कि मैं इस आम अथवा कटहलके वृक्षका रस हूँ, जिस प्रकार कि लोकमें बहुत-से चेतन प्राणियोंके एकत्रित होनेपर इस प्रकार विवेक हुआ करता है कि 'मैं इसका पुत्र हूँ, इसका नाती हूँ' इत्यादि और इस प्रकार विवेक रखनेके कारण वे आपसमें नहीं मिलते, उसी प्रकार यहाँ मधुरूपसे एकताको प्राप्त हुए अनेकों वृक्षोंके मीठे, खट्टे, तीखे अथवा कड़वे रसोंका मधुर आदि रूपसे विवेक ग्रहण नहीं किया जाता—ऐसा इसका अभिप्राय है।
यथायं दृष्टान्त इत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाजैसा कि यह दृष्टान्त है ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा