छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 677, कुल 978 में से
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खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३
| शाङ्करभाष्य | भाुष्यार्थ |
|---|---|
| हि जीव इति तदुपसंहार उपसंह्रियते । जीवेन च प्राणयुक्तेनाशितं पीतं च रसतां गतं जीववच्छरीरं वृक्षं च वर्धयद्रसरूपेण जीवस्य सद्भावे लिङ्गं भवति । अशितपीताभ्यां हि देहे जीवस्तिष्ठति ते चाशितपीते जीवकर्मानुसारिणी इति । तस्यैकाङ्गवैकल्यनिमित्तं कर्म यदोपस्थितं भवति तदा जीव एकां शाखां जहाति शाखाया आत्मानमुपसंहरति । अथ तदा सा शाखा शुष्यति । | उनका उपसंहार होनेपर वह भी उपसंहृत हो जाता है । प्राणयुक्त जीवके द्वारा भी भक्षण तथा पान किया हुआ अन्न-जल रसभावको प्राप्त होता है; वह रसरूपसे जीवयुक्त शरीर तथा सजीव वृक्षकी वृद्धि करता हुआ जीवके सद्भावमें लिङ्ग है । खाये-पीये हुए अन्न-जलसे ही जीव देहमें रहता है । वे खानपान जीवके कर्मानुसार होते हैं । जिस समय उसके एक अङ्गकी विकलताका निमित्तभूत कर्म उपस्थित होता है उस समय जीव एक शाखाको छोड़ देता है—उस एक शाखासे अपना उपसंहार कर लेता है । इसके पश्चात् तब वह शाखा सूख जाती है । |
| जीवस्थितिनिमित्तो रसो जीवकर्माक्षिप्तो जीवोपसंहारे न तिष्ठति । रसापगमे च शाखा शोषमुपैति तथा सर्वं वृक्षमेव यदायं जहाति तदा सर्वोऽपि वृक्षः शुष्यति । वृक्षस्य रसस्रवणशोषणादिलिङ्गाज्जीववत्त्वं दृष्ट्वा- | जीवके कर्मानुसार प्राप्त हुआ तथा जीवकी स्थितिके कारण रहनेवाला रस जीवका उपसंहार होनेपर नहीं रहता; और रसके निकल जानेपर शाखा सूख जाती है । इसी प्रकार जब यह सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा ही वृक्ष सूख जाता है । वृक्षके रसस्राव एवं शोषण आदि लिङ्गसे उसकी सजीवता सिद्ध होती है तथा [ 'स एष वृक्षः जीवेन आत्मना अनु- |