छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
| उद्यन्नुद्गच्छन्वा एष प्रजाभ्यः प्रजार्थमुद्गायति प्रजानामन्नोत्पत्त्यर्थम् । न ह्यनुद्यति तस्मिन् व्रीह्यादेर्निष्पत्तिः स्यादत उद्गायतीवोद्गायति, यथैवोद्गातान्नार्थम् । अत उद्गीथः सवितेत्यर्थः । <br><br> किं चोद्यन्नैशं तमस्तज्जं च भयं प्राणिनामपहन्ति तमेवंगुणं सवितारं यो वेद सोऽपहन्ता नाशयिता ह वै भयस्य जन्ममरणादिलक्षणस्य आत्मनस्तमसश्च तत्कारणस्य अज्ञानलक्षणस्य भवति ॥ १ ॥ | यह [आदित्य] उदित होता हुआ—ऊपरकी ओर जाता हुआ प्रजाके लिये—प्रजाओंके अन्नकी उत्पत्तिके लिये उद्गान करता है, क्योंकि उसके उदित न होनेपर व्रीहि आदिकी निष्पत्ति नहीं हो सकती; अतः जिस प्रकार उद्गाता अन्नके लिये उद्गान करता है, उसी प्रकार वह उद्गान करनेके समान उद्गान करता है। अतः सूर्य उद्गीथ है—यह इसका तात्पर्य है। <br><br> इसके सिवा, वह उदित होकर रात्रिके अन्धकार और उससे होनेवाले प्राणियोंके भयका भी नाश करता है। जो इस प्रकारके गुणसे युक्त सविताकी उपासना करता है, वह जन्म-मरणादिरूप आत्माके भय और अन्धकारका अर्थात् उसके कारणभूत अज्ञानका नाश करनेवाला होता है ॥ १ ॥ |
सूर्य और प्राणकी समानता तथा प्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना
| यद्यपि स्थानभेदात्प्राणादित्यौ भिन्नाविव लक्ष्येते तथापि न स तत्त्वभेदस्तयोः, कथम् ? | यद्यपि स्थानभेदके कारण प्राण और आदित्य भिन्न-से दिखायी देते हैं, तथापि वह उनका तात्त्विक भेद नहीं है। किस प्रकार ? [ यह बतलाते हैं— ] |