छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं ६९
व्यानप्रयुक्त होनेसे वाक्, ऋक्, साम और उद्गीथकी समानता
या वाक्सर्क्तस्मादप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति यर्क्तत्साम तस्मादप्राणन्नपानन्साम गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्नपानन्नुद्गायति ॥ ४ ॥
जो वाक् है वही ऋक् है। उसीसे पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ऋक् का उच्चारण करता है। जो ऋक् है वही साम है। इसीसे प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ सामगान करता है। जो साम है वही उद्गीथ है। इसीसे प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ उद्गान करता है ॥ ४ ॥
| तथा वाग्विषेषामृचम्, ऋक्संस्थं च साम, सामावयवं चोद्गीथम्, अप्राणन्नपानन्व्यानेनैव निर्वर्तयतीत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार वाग्विषेष ऋक्, ऋक्सि्थत साम और सामके अवयवभूत उद्गीथको भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ केवल व्यानसे ही सम्पन्न करता है—यह उसका अभिप्राय है ॥४॥ |
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| न केवलं वागाद्यभिव्याहरणमेव— | केवल वाणी आदिका उच्चारण ही नहीं— |
अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्नपानँस्तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ॥ ५ ॥
इसके सिवा जो और भी वीर्ययुक्त कर्म हैं; जैसे—अग्निका मन्थन; किसी सीमातक दौड़ना तथा सुदृढ़ धनुषको खींचना—इन सब कर्मोंको भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ही करता है। इस कारण व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये ॥ ५ ॥