भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 757

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५३


| व्याधीयन्ते प्राणा दुःखिनो भवन्ति। किन्निमित्तम् ? इत्याह— अन्नमस्मिन् संवत्सरे नः कनी- योऽल्पतरं भविष्यतीति ।<br><br>अथ पुनर्यदा सुवृष्टिर्भवति तदानन्दिनः सुखिनो हृष्टाः प्राणाः प्राणिनो भवन्त्यन्नं बहु प्रभूतं भविष्यतीति । अप्सम्भव- त्वान्मूर्तस्यान्नस्याप एवेमा मूर्ता मूर्तभेदाकारपरिणता इति मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्ष- मित्यादि, आप एवेमा मूर्ता अतोऽप उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | प्राण व्यथित—दुःखी होते हैं । किसलिये दुःखी होते हैं ? यह श्रुति बतलाती है—इस वर्ष हमारे लिये थोड़ा अन्न होगा—इसलिये ।<br><br>और फिर जिस समय सुवृष्टि होती है उस समय प्राण अर्थात् प्राणी सुखी—हर्षित होते हैं कि [ इस बार ] बहुत-सा यानी खूब अन्न होगा। क्योंकि मूर्त्त अन्न जलसे उत्पन्न हुआ है इसलिये यह मूर्त्त अर्थात् मूर्तिमान् भेदके आकारमें परिणत हो जानेके कारण जो मूर्त्ति- मती हैं वह यह पृथिवी और अन्त- रिक्ष इत्यादि मूर्तिमान् जल ही हैं । अतः तुम जलकी उपासना करो ॥ १ ॥ |


स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान्कामाꣳस्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽद्भ्यो भूय इत्यद्भ्यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २॥

वह जो कि जलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और तृप्तिमान् होता है । जहाँतक जलकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि जलकी