छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 769, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १४]
शाङ्करभाष्यार्थ
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| धीतेऽधीत्य च तदर्थं ब्राह्मणेभ्यो विधींश्च श्रुत्वा कर्माणि कुरुते तत्फलाशयैव पुत्रांश्च पशूंश्च कर्मफलभूतानिच्छतेऽमिवाञ्छत्याशयैव तत्साधनान्यनुतिष्ठति । इमं च लोकमाशेद्ध एव स्मरँल्लोकसंग्रहहेतुभिरिच्छते । अमुं च लोकमाशेद्धः स्मरंस्तत्साधनानुष्ठानेनेच्छतेऽत आशारशनावबद्धं स्मराकाशादि नामपर्यन्तं जगच्चक्रीभूतं प्रतिप्राणि । अत आशायाः स्मरादपि भूयस्त्वमित्यत आशामुपास्स्व ॥ १ ॥ | अध्ययन करता है तथा उनका अध्ययन कर और ब्राह्मणोंके मुखसे उनका अर्थ एवं विधि श्रवण कर उनके फलकी आशासे ही कर्म करता है तथा कर्मके फलभूत पुत्र और पशुओंकी इच्छा-कामना करता है एवं आशासे ही उनके साधनोंका अनुष्ठान करता है। आशासे समृद्ध हुआ ही वह लोकसंग्रहरूप हेतुओंसे इस लोकका स्मरण करता हुआ इसको इच्छा करता है तथा आशासे समृद्ध हुआ ही वह परलोककी, उसके साधनोंका अनुष्ठान करते हुए इच्छा करता है । इस प्रकार आशारूप रस्सीसे बँधा हुआ यह स्मर एवं आकाशसे लेकर नामपर्यन्त जगत् प्रत्येक प्राणीमें चक्रकी भाँति घूम रहा है। इसलिये आशा स्मरकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट है; अतः तुम आशाकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशायास्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवन्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥