भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 820
८१६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| तदुक्तं पूर्वमेव न वधेनास्य हन्यत इति किमर्थं पुनरुच्यते ? | शङ्का—'इस (शरीर) के नाशसे उसका नाश नहीं होता'—यह बात तो पहले ही कही जा चुकी है, फिर इसे पुनः क्यों कहा जाता है ? | | यद्यपि देहसम्बन्धिभ्यां जरा-मृत्युभ्यां न सम्बध्यते। अन्यथापि सम्बन्धस्ताभ्यां स्यादित्याशङ्कानिवृत्त्यर्थम्। | समाधान—यद्यपि देह-सम्बन्धी जरा-मृत्युसे उसका सम्बन्ध नहीं होता तो भी अन्य प्रकारसे तो उनके साथ उसका सम्बन्ध हो ही सकता है—इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये ऐसा किया गया है। | | विशोको विगतशोकः। शोको नामेष्टादिवियोगनिमित्तो मानसः सन्तापः। विजिघत्सो विगताशनेच्छः। अपिपासोऽपानेच्छः। | वह—विशोक—शोकरहित—इष्टादिका वियोग होनेके कारण जो मानसिक संताप होता है उसे शोक कहते हैं, विजिघत्स—भोजनेच्छासे रहित और अपिपास—पीनेकी इच्छासे रहित है। | | नन्वपहतपाप्मत्वेन जरादयः शोकान्ताः प्रतिषिद्धा एव भवन्ति। कारणप्रतिषेधात्। धर्माधर्मकार्या हि त इति। जरादिप्रतिषेधेन वा धर्माधर्मयोः कार्याभावे विद्यमानयोरप्यसत्समत्वमिति पृथक्प्रतिषेधोऽनर्थकः स्यात्। | शङ्का—किंतु अपहतपाप्मत्वके द्वारा तो जरासे लेकर शोकपर्यन्त सभी विशेषण प्रतिषिद्ध हो जाते हैं, क्योंकि उनके कारणका प्रतिषेध हो जाता है, कारण वे सब धर्माधर्मके ही कार्य हैं; अथवा जरादिके प्रतिषेधसे धर्माधर्मका कोई कार्य न रहनेके कारण, विद्यमान रहते हुए भी, उनका असत्समत्व सिद्ध होता है। इसलिये इन दोनोंका पृथक् प्रतिषेध निरर्थक ही है। |