भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 828, कुल 978 में से

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पृष्ठ 828
८२४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

और यदि वह गीतवाद्यसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही गीत-वाद्य वहाँ प्राप्त हो जाते हैं। उस गीतवाद्य-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ८ ॥

अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन सम्पन्नो महीयते॥९॥

और यदि वह स्त्रीलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्प-मात्रसे ही स्त्रियाँ उसके पास उपस्थित हो जाती हैं। उस स्त्रीलोकसे सम्पन्न हो वह महिमान्वित होता है ॥ ९ ॥

| समानमन्यत्। मातरो जनयित्र्योऽतीताः सुखहेतुभूताः सामर्थ्यात्। न हि दुःखहेतुभूतासु ग्रामसूकरादिजन्मनिमित्तासु मातृषु विशुद्धसत्त्वस्य योगिन इच्छा तत्सम्बन्धो वा युक्तः ॥ २–९ ॥ | शेष सब इसीके समान है। मातृगण अर्थात् अतीत जन्म देनेवाली माताएँ जो योग्यताके अनुसार सुखकी हेतुभूता हैं, क्योंकि दुःखकी हेतुभूत ग्रामसूकरादि जन्मोंकी कारणस्वरूपा माताओंके प्रति विशुद्धचित्त योगीकी इच्छा अथवा उनसे सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है ॥२-९॥ |

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यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ॥१०॥

वह जिस-जिस प्रदेशकी कामना करनेवाला होता है और जिस-जिस भोगकी इच्छा करता है वह सब उसके संकल्पसे ही उसको प्राप्त हो जाता है। उससे सम्पन्न होकर वह महिमाको प्राप्त होता है ॥१०॥