छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 833, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९
| मजानन्तस्ते निधेरुपर्य्युपरि सञ्चरन्तोऽपि निधिं न विन्देयुः शक्यवेदनमपि; एवमेवेमा अविद्यावत्यः सर्वा इमाः प्रजा यथोक्तं हृदयाकाशाख्यं ब्रह्मलोकं ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोकस्तमहरहः प्रत्यहं गच्छन्त्योऽपि सुषुप्तकाले न विन्दन्ति न लभन्ते एषोऽहं ब्रह्मलोकभावमापन्नोऽस्मीतीति । अनृतेन हि यथोक्तेन हि यस्मात्प्रत्यूढा हृताः स्वरूपादविद्यादिदोषैर्बहिरपकृष्टा इत्यर्थः । अतः कष्टमिदं वर्तते जन्तूनां यत्स्वायत्तमपि ब्रह्म न लभ्यत इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥ | निहित—निक्षिप्त ( रखी हुई ) उस सुवर्णनिधिको जिस प्रकार उस स्थानसे अनभिज्ञ—निधिशास्त्रद्वारा निधिक्षेत्रको न जाननेवाले पुरुष निधि के ऊपर सञ्चार करते हुए भी, जिसका ज्ञान प्राप्त होना सम्भव भी है उस निधिको भी नहीं जानते उसी प्रकार यह सम्पूर्ण अविद्यावती प्रजा उपर्युक्त हृदयाकाशसंज्ञक लोकको—ब्रह्म यही लोक है उस ब्रह्मलोकको सुषुप्तिकालमें प्रतिदिन जानेपर भी 'यह मैं इस समय ब्रह्मलोकभावको प्राप्त हो गया हूँ' इस प्रकार नहीं उपलब्ध करतीं, क्योंकि वह उपर्युक्त अनृतसे प्रत्यूढ—हृत है अर्थात् अविद्यादिदोषोंद्वारा—अपने स्वरूपसे बाहर खींच ली गयी है । अतः यह बड़े कष्टकी बात है कि स्वायत्त होनेपर भी जीवोंको ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होती—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥२॥ |
स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तꣳहृद्यमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमिति ॥३॥
वह यह आत्मा हृदयमें है 'हृदि अयम्' ( यह हृदयमें है ) यही इसका निरुक्त ( व्युत्पत्ति ) है । इसीसे यह 'हृदय' है । इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वर्गलोकको जाता है ॥ ३ ॥