भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 834, कुल 978 में से

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पृष्ठ 834
८३०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| स वै यः 'आत्मापहतपाप्मा' इति प्रकृतो वैशब्देन तं स्मारयति, एष विवक्षित आत्मा हृदि हृदयपुण्डरीक आकाशशब्देनाभिहितः । तस्यैतस्य हृदयस्यैतदेव निरुक्तं निर्वचनं नान्यत् । हृद्ययमात्मा वर्तत इति यस्मात्तस्माद्धृदयम् । हृदयनामनिर्वचनप्रसिद्ध्यापि स्वहृदय आत्मेत्यवगन्तव्यमित्यभिप्रायः । अहरहर्वे प्रत्यहमेवंविद्धृद्ययमात्मेति जानन् स्वर्गं लोकं हार्दं ब्रह्मैति प्रतिपद्यते । | वह जो आत्मा है, 'आत्मापहतपाप्मा' इस प्रकार जिसका प्रकरण है उस आत्माका ही श्रुति 'वै' शब्दसे स्मरण कराती है । यह विवक्षित आत्मा हृदय-पुण्डरीकमें 'आकाश' शब्दसे कहा गया है । उस इस हृदयका यही निरुक्त-निर्वचन (व्युत्पत्ति) है, अन्य नहीं । क्योंकि यह आत्मा हृदयमें विद्यमान है इसलिये यह हृदय है । इस प्रकार 'हृदय' इस नामके निर्वचनकी प्रसिद्धिसे भी 'आत्मा अपने हृदयमें है' ऐसा जानना चाहिये—ऐसा इसका अभिप्राय है । अहरहः—प्रतिदिन इस प्रकार जाननेवाला अर्थात् 'यह आत्मा हृदयमें है' इस प्रकार जाननेवाला पुरुष स्वर्गलोक—हृदयस्थ ब्रह्मको प्राप्त होता है । | | नन्वनेवंविदपि सुषुप्तकाले हार्दं ब्रह्म प्रतिपद्यत एव सुषुप्तकाले सता सोम्य तदा सम्पन्न इत्युक्तत्वात् । | **शङ्का—**किंतु इस प्रकार न जाननेवाला भी सुषुप्तकालमें ब्रह्मको प्राप्त होता ही है, क्योंकि सुषुप्तकालमें 'हे सोम्य ! उस समय यह सत्‌से सम्पन्न हो जाता है' ऐसा कहा गया है । | | बाढमेवं तथाप्यस्ति विशेषः । | **समाधान—**ठीक है, ऐसा ही है । तो भी कुछ विशेषता है । | | यथा जानन्नजानंश्च सर्वो जन्तुः | जिस प्रकार विद्वान् और अविद्वान् |

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