भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 853

खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१


साधनत्वं गम्यते ।प्रतीत होता है ।
सत्यं गम्यते, न त्विह ब्रह्मलोकं प्रति यज्ञादीनां साधनत्वमभिप्रेत्य यज्ञादिभिर्ब्रह्मचर्यं स्तूयते । किं तर्हि ? तेषां प्रसिद्धं पुरुषार्थसाधनत्वमपेक्ष्य । यथेन्द्रादिभी राजा न तु यत्रेन्द्रादीनां व्यापारस्तत्रैव राज्ञ इति तद्वत् ।**गुरु—**ठीक है, ऐसा प्रतीत होता है । किंतु यहाँ, ब्रह्मलोकके प्रति यज्ञादिका साधनत्व है—ऐसे अभिप्रायसे यज्ञादिके द्वारा ब्रह्मचर्यकी स्तुति नहीं की जाती । तो फिर क्या बात है ?—उनके प्रसिद्ध पुरुषार्थसाधनत्वकी अपेक्षासे ही स्तुति की जाती है, जिस प्रकार कि इन्द्रादिरूपसे राजाकी । इससे यह अभिप्राय नहीं होता कि जहाँ इन्द्रादिका व्यापार है वहीं राजाका भी है [ अर्थात् जो काम इन्द्रादि देवगण करते हैं वही राजा भी करता है ] । उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ।
(ब्रह्मलोकादिभोगानां स्वरूपविचारः)<br><br>य इमेऽर्णवादयो ब्राह्मलौकिकाः संकल्पजाश्च पित्रादयो भोगास्ते किं पार्थिवा आप्याश्च यथेह लोके दृश्यन्ते तद्वदर्णववृक्षपूःस्वर्णमण्डपान्याहो स्विन्मानसप्रत्ययमात्राणीति ।[ भला सोचो तो ] ये जो ब्रह्मलोकसम्बन्धी समुद्रादि और संकल्पजनित पितृलोकादिके भोग हैं वे—जैसे कि इस लोकमें समुद्र, वृक्ष, पुरी और सुवर्णमय मण्डप देखे जाते हैं उन्हींके समान पृथ्वी और जलके विकार हैं, अथवा केवल मानसिक प्रतीतिमात्र हैं ?