भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 890
८८६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

क्त्ययजमानमयजनस्वभावमाहु-<br>रासुरः खल्वयं यत एवंस्वभावो<br>बतेति खिद्यमाना आहुः शिष्टाः।<br>असुराणां हि यस्मादश्रद्दधानता-<br>दिलक्षणैषोपनिषत् ।<br><br>तयोपनिषदा संस्कृताः सन्तः<br>प्रेतस्य शरीरं कुणपं भिक्षया<br>गन्धमाल्यान्नादिलक्षणया वस-<br>नेन वस्त्रादिनाच्छादनादिप्रका-<br>रेणालङ्कारेण ध्वजपताकादिक-<br>रणेनेत्येवं संस्कुर्वन्त्येतेन कुणप-<br>संस्कारेणामुं प्रेत्य प्रतिपत्तव्यं<br>लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥५॥सत्कार्योंमें श्रद्धा न रखनेवाले और<br>अयजमान—जिसका स्वभाव<br>यथाशक्ति यजन करनेका नहीं है<br>उस पुरुषको शिष्टजन 'क्योंकि<br>यह ऐसे स्वभाववाला है इसलिये<br>निश्चय यह आसुर ही है' ऐसा<br>खेद करते हुए कहते हैं; क्योंकि<br>यह अश्रद्धानता आदि लक्षणोंवाली<br>उपनिषद् असुरोंकी ही है।<br><br>उस उपनिषद्से संस्कारयुक्त<br>होकर वे मृतक पुरुषके शरीर अर्थात्<br>शवको गन्ध, पुष्प एवं अन्नादिरूप<br>भिक्षा, वसन--वस्त्रादिद्वारा<br>आच्छादनादि करनेकी विधिसे और<br>ध्वजा-पताकादि लगानेरूप<br>अलंकारसे संस्कृत करते हैं और<br>ऐसा मानते हैं कि इस शवके<br>संस्कारसे हम मरकर अपने प्राप्त<br>होनेयोग्य लोकको प्राप्त कर लेंगे।५।

इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये ऽष्टमखण्ड-
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥