छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 941, कुल 978 में से
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त्रयोदश खण्ड
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‘श्यामाच्छबलम्’ इस मन्त्रका उपदेश
श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीत्यभिसम्भवामीति ॥ १ ॥
मैं श्याम (हृदयस्थ) ब्रह्मसे शबल ब्रह्मलोक प्राप्त होऊँ और शबलसे श्यामको प्राप्त होऊँ। अश्व जिस प्रकार रोएँ झाड़कर निर्मल हो जाता है उसी प्रकार मैं पापोंको झाड़कर तथा राहुके मुखसे निकले हुए चन्द्रमाके समान शरीरको त्यागकर कृतकृत्य हो अकृत (नित्य) ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ, ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ॥ १ ॥
| श्यामाच्छबलं प्रपद्य इत्यादि- | ‘श्यामाच्छबलं प्रपद्ये’ इत्यादि |
|---|---|
| मन्त्राम्नायः पावनो जपार्थश्च | मन्त्र पवित्र करनेवाला है और |
| ध्यानार्थो वा । श्यामो गम्भीरो | यह जप अथवा ध्यानके लिये है। |
| वर्णः श्याम इव श्यामो हार्दं | श्याम यह गम्भीर वर्ण है। हृदयस्थ |
| ब्रह्मात्यन्तदुरवगाह्यत्वात्तद्धार्दं | ब्रह्म अत्यन्त दुर्गम होनेके कारण |
| ब्रह्म ज्ञात्वा ध्यानेन तस्माच्छ्या- | श्याम वर्णके समान श्याम है, उस |
| माच्छबलं शबल इव शबलोऽर- | हृदयस्थ ब्रह्मको जानकर ध्यानके |
| ण्याद्यनेककाममिश्रत्वाद्व्रह्मलो- | द्वारा उस श्याम ब्रह्मसे शबल |
| ब्रह्मको—जो शबलके समान शबल | |
| है, क्योंकि ब्रह्मलोक अरण्यादि | |
| अनेक कामनाओंसे युक्त है इसलिये |