चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ चरकसंहिता [अ० ६ प्रकार कि कुम्हार बर्तन पकाते समय या ईंटों के भट्ठे में आग को अन्दर ही बन्द कर देते हैं, और वहाँ पर अग्नि तीव्र हो जाती है, उसी प्रकार) प्रबल हो उठती है। इसलिये मनुष्यों की जठराग्नि काल स्वभाव से ही हेमन्त में प्रबल और अधिक मात्रा में भोजन को पचाने में समर्थ होती है। इस समय यदि जाठराग्नि को अग्नि बल के अनुसार अन्न रूपी आहार न मिले, तो शरीर के सौम्य (द्रव्य) भाग को नष्ट करने लगती है। इसलिये शीत काल में शीत गुण के बढ़ने से वायु भी बढ़ती है। इस वायु की वृद्धि को रोकने के लिये स्निग्ध (मधुर), अम्ल और नम- कीन पदार्थ खाने चाहिये। चर्बी वाले जलचर प्राणियों का मांस रस, बिल में रहने वाले (नकुल आदि) पशुओं का मांस, प्रसह (कुक्कुट आदि) पक्षियों का मांस खाना चाहिये, मांस खाकर ऊपर से मदिरा सीधु (गुड़ की शराब) और मधु पीना चाहिये। दूध, दही, मावा आदि एवं गन्ने के रस से बनी खीर, राब, शर्करा आदि से बनी वस्तुएँ, वसा, तैल और नये चावल खाने चाहिये। हेमन्त काल में स्नान आदि में गरम पानी का व्यवहार करने वाले की आयु कम नहीं होती। तैलमर्दन, उबटन, शिर पर तैल लगाना, जेन्ताक (स्वेद,) धूप का सेवन, भूमि के नीचे बने तहखानों में रहना, घर के अन्दर घर बना उसे गरम करके रहना चाहिये, भली प्रकार घिरा हुआ घर हो, आसन या सवारी आदि करते समय खूब लिपटकर बैठे जिससे शीत न लगे ॥ ६-१४ ॥ प्रावाराजिन-कौशेय-प्रवेणी-कुथकास्तृतम् ॥ १५ ॥ गुरूष्णवासा दिग्धाङ्गो गुरुणाऽगुरुणा सदा । शयने प्रमदां पीनां विशालोपचितस्तनीम् ॥ १६॥ आलिङ्ग्याऽगुरुदिग्धाङ्गीं सुप्यात्ससदमन्मथः । प्रकामं च निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ॥ १७ ॥ वर्जयेदन्नपानानि लघूनि वातलानि च । प्रवातं प्रमिताहारमुदमन्थं हिमांगमे ॥ १८ ॥ भारी कम्बल, मृग छाल ( कौशेय ) रेशम, (प्रवेणी ) कम्बल, गद्दे इनको फैलाकर भारी और गरम कपड़ों को पहिनकर मनुष्य अङ्गों पर अगर का गाढ़ा लेप सदा करे। भरे शरीर वाली (दुबली-पतली नहीं), कामवती एवं उन्नत स्तनों वाली, अङ्गों पर अगर का लेप की हुई स्त्री का आलिङ्गन करके हर्ष और कामेच्छा के साथ सोये। शिशिर ऋतु में मैथुन यथेच्छ सेवन करे।