चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६ )
[बायाँ स्तम्भ] उनको दिन में सोने से लाभ । दिन में सोने का उचित काल-ग्रीष्म ऋतु-अन्य ऋतुओं में दिन में सोने से हानियाँ । रात्रिजागरण के दोष । निद्रोत्पादक उपाय । अनुचित निद्रा को रोकने के उपाय । उपसंहार । द्वाविंशतितमोऽध्यायः (पृ०२५६-२६१) लंघनबृंहणीयः—वैद्य का लक्षण लंघन, बृंहण, स्नेहन, स्तंभन के सम्ब- न्ध में अग्निवेश का प्रश्न । आत्रेय पुनर्वसु का प्रतिवचन । लंघन, बृंहण, स्वेदन, स्तम्भन के लक्षण । लंघन, बृंहण आदि कारक द्रव्यों के कारण । लंघन के योग्य व्यक्ति । बृंहण के योग्य द्रव्य और व्यक्ति । विरूक्षण करने योग्य व्यक्ति और द्रव्य । स्तम्भन द्रव्य और स्तंभन योग्य व्यक्ति । सम्यक् लंघन और लंघन के अतियोग के लक्षण । सम्यक् बृंहण और बृंहण के अतियोग के लक्षण । रूक्षण के सम्यकयोग और अतियोग । स्तम्भन के सम्यकयोग और अतियोग के लक्षण । लंघन आदि छः क्रियाओं के अयोग, हीनयोग के दुष्परिणाम । त्रयोविंशतितमोऽध्यायः पृ० २६१-२६६ सन्तर्पणीयः—सन्तर्पणजन्य रोग के कारण । रोगों के लक्षण—उनकी चिकित्सा । अपतर्पण और तज्जन्य रोग— उनका उपशमन । चतुर्विंशतितमोऽध्यायः पृ० २६७-२७४ विधिशोणितीयः—विशुद्ध रक्त का लाभ । रक्त दूषित होने के कारण
[दायाँ स्तम्भ] और लक्षण । चिकित्सा । विशुद्ध रक्त का लक्षण । विशुद्ध रक्त वाले पुरुष का लक्षण । मद के लक्षण । मूर्च्छा के लक्षण । अपस्मार और संन्यास के लक्षण । इन के उपाय । उपसंहार । पञ्चविंशतितमोऽध्यायः पृ०२७५-२८१ यज्जःपुरुषीयः—पुरुष और रोग की उत्पत्ति पर ऋषियों का संवाद । पारीक्षि मौद्गल्य का मत पुरुष और रोगों का उपादान कारण 'आत्मा' है । शरलोमा का मत पुरुष और रोगों का उत्पादन 'सत्त्व' है । वार्योविद का मत प्राणियों और रोगों का उत्पत्ति मूल 'रस' है । कुशिक हिरण्याक्ष का मत पुरुष और रोग ६ धातुओं से उत्पन्न होते हैं । शौनक का मन रोगों और पुरुष की उत्पत्ति माता पिता से हुई । भद्रकाप्य का मत कर्म से पुरुष और रोग उत्पन्न होते हैं । भरद्वाज का मत कर्त्ता से स्वभावतः पुरुष और रोग उत्पन्न होते हैं । कांकायन का मत सुख दुःख, चेतन अचेतन का कर्त्ता प्रजापति हैं । आत्रेय भिक्षु का मत पुरुष और रोगादि काल से उत्पन्न होते हैं पुनर्वसु आत्रेय का सिद्धान्त पञ्च महाभूतों से पुरुष और उनसे ही रोग उत्पन्न हुए । इस पर पुरुषों और रोगों की वृद्धि के कारण के विषय में काशिपतिवामक का प्रश्न । भगवान् आत्रेय का प्रति- वचन हिताहित सेवन । अग्निवेश आत्रेय संवाद हित अहित का लक्षण । आहार द्रव्य पर विचार । हित आहार ।