भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 639 में से

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१०२ चरकसंहिता [ अ० ७ होने से मल का क्षय समझना चाहिये। मल के स्थानों से मल के न निकलने से मल का क्षय, मल स्थानों से मल का बार-बार अधिक बाहर निकलना वृद्धि को बताता है । मलों की वृद्धि और क्षय दूसरों के कारण हुए हैं, यह समझकर उनके चिन्हों से पहिचानकर उन से उत्पन्न साध्य रोगों को रोग और व्याधि के हेतु इन दोनों के विपरीत गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव से विरुद्ध औषध, आहार और विहार द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । चिकित्सा करते समय वैद्य मात्रा औषध, आहार और विहार का परिमाण काल, दोष, व्याधि के प्रकोप, ऋतु, रात, दिन आदि समयों का विचार कर ले। ये विषम धातु वाले रोगी और नीरोगी इन दोनों के लिये हितकारी हैं, धातु की विषमता से उत्पन्न होने वाले रोग और मानस या आगन्तुज रोग नहीं उत्पन्न होते । इसलिये मनुष्य रोगी नहीं होता, रोगी न हो अतः रोगी होने से पूर्व ही स्वस्थवृत्त का सेवन करना चाहिये ॥ ४२-४५ ॥ कारण से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचने के उपाय— माधव-प्रथमे मासि नभस्य-प्रथमे पुनः । सहस्य-प्रथमे चैव हारयेद्दोषसंचयम् ॥ ४६ ॥ स्निग्ध-स्विन्न-शरीराणामूर्ध्वं चाधश्च बुद्धिमान् । बस्तिकर्म ततः कुर्यान्नस्तः कर्म च बुद्धिमान् ॥ ४७ ॥ यथाक्रमं यथायोगमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् । रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांश्च कालवित् ॥ ४८ ॥ रोगास्तथा न जायन्ते प्रकृतिस्थेषु धातुषु । धातवश्चाभिवर्धन्ते जरा-मान्द्यमुपैति च ॥ ४९ ॥ विधिरेश विकाराणामनुत्पत्तौ निदर्शितः । निजानामितरेषां तु पृथगेवोपदिष्यते ॥ ५० ॥ वैशाख और इस से पूर्व के मास अर्थात् चैत्र में, और भाद्रपद, इससे पूर्वके मास अर्थात् श्रावण में तथा पौष इससे मास पूर्व के मार्गशीर्ष में एकत्रित दोषों को वमन विरेचन आदि से निकाल देना चाहिये । हेमन्त ऋतु में संचित कफ को चैत्र मास में ग्रीष्म में संचित वायुको श्रावण मास में, वर्षा में संचित पित्त को मार्गशीर्ष में निकाल देना चाहिये । इन मासों में दोषों के प्रकोप होने का भय रहता है, इसलिये प्रको[प] होने से पूर्व ही दोषों को निकाल देना चाहिये । पहिले शरीर को स्नि[ग्ध] [घृत] और आदि से चिकना करके पसीना देना चाहिये जिससे कि शरीर के म्ने[द] [स्वेद]

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