चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ चरकसंहिता [ अ० ८ न विद्युतस्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं तान्तं न विस्वरं नानवस्थि- तपंदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिकलीवं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरै- रध्ययनमभ्यसेत् ॥ २६ ॥ निम्न अवस्थाओं में अध्ययन-पठन नहीं करना चाहिये—ऋतु के बिना बिजली चमकने पर, दिशाओं के जलने पर, ग्राम नगर आदि में आग लगने पर, भूकम्प आने पर, विवाहादि बड़े उत्सवों में, विजयादशमी, दीपमालिका होली आदि में, उल्कापात होने पर, चन्द्रग्रहण, या सूर्यग्रहण होने पर, कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा को जिन तिथियों में चन्द्रमा नहीं दीखता, सन्ध्या कालों में, गुरुके मुख से बिना पढ़े, अक्षर को छोड़ते हुए, खाते हुए, अधिक मात्रा में, रूक्ष स्वर से, स्वर के बिना, पदों की व्यवस्था के बिना, विराम आदि चिह्नों का ध्यान न रखकर, रुक रुक कर, अति निर्बल (बलहीन), बहुत ऊँची आवाज से बहुत जोर से, बहुत धीमी आवाज से भी नहीं पढ़ना चाहिये ॥ २६ ॥ नातिसमयं जह्यात् । न नियमं भिन्द्यात् । न नक्तं नादेशे चरेत् । न सन्ध्यास्वभ्यवहाराध्ययन-स्त्री-स्वप्न-सेवी स्यात् । न बाल-वृद्ध-लुब्ध- मूर्ख-क्लिष्ट-क्लीबैः सह सख्यं कुर्यात् । न मद्य-द्यूत-वेश्या-प्रसङ्ग-रुचिः स्यात्, न गुह्यं विवृणुयात् । न कञ्चिदवजानीयात् । नाहंमानी स्यान्नादक्षो नादक्षिणा नासूयकः । न ब्राह्मणान् परिवदेत् । न गवां दण्डमुद्यच्छेत्, न वृद्धान् न गुरून् न गणान् न नृपान् वाऽधिक्षिपेत् । न चातिब्रूयात् । न बान्धवानुरक्तकृच्छ्रद्वितीयगुह्यज्ञान् बहिः कुर्यात् ॥ २७ ॥ समय को न खोये । नियम का उल्लंघन न करे । रात्रि में न घूमे । जंगल आदि बीयाबान स्थानों में न घूमे । सन्ध्या समयों में भोजन, अध्ययन, मैथुन, नींद नहीं करनी चाहिये । बालक, वृद्ध, लालची, मूर्ख, कुष्ठ रोगी, नपुंसक अनु- त्साही अल्पसत्त्व के साथ मित्रता न करे । मद्य शराब, जुआ, वेश्या इनमें मन नहीं लगाये । गुप्त रहस्य को न कहे । किसी का भी अपमान न करे । अहंकार या घमण्ड न करे । कार्यों में मूढ़ न रहे । गुणों में दोषों को न देखे । निन्दक, चुगलखोर न बने । ब्राह्मणों की निन्दा न करे । गाय के प्रति हाथ उठाये । जो अपने अनुकूल हों उनकी निन्दा न करे । गुरु, [..] और आचार्य, सभा, वयोवृद्ध, जनसमूह, समाज और राजा की [...]