भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 639 में से

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१३८ चरकसंहिता [ अ० ११ अत एवानुमीयते—यत्स्वकृतमपरिहार्यमविनाशि पौर्वदेहिकं दैवसंज्ञकमानुबन्धिकं कर्म, तस्यैतत्फलम्, इतश्चान्यद्भविष्यतीति । फलाद्बीजमनुमीयते, फलं च बीजात् ॥ ३० ॥ उपरोक्त बातों को देखकर ही अनुमान भी किया जाता है कि अपना किया हुआ कर्म नहीं छोड़ा जा सकता, उसका विनाश नहीं हो सकता, पूर्व जन्म में किया हुआ 'भाग्य' नामक आनुबन्धिक अर्थात् आत्मा के साथ परलोक में भी निश्चित रूप से बँधा हुआ है । उसी का यह फल है जो कि माता पिता से पुत्र भिन्न प्रकृति के उत्पन्न होते हैं इत्यादि । यहां किये कर्म से दूसरा जन्म होगा, बीज से फल का अनुमान होता है, कर्म से पुनर्जन्म का और पुनर्जन्म से कर्म का अनुमान होता है ॥ ३० ॥ युक्तिश्चैषा—षड्धातुसमुदायाद् गर्भजन्म, कर्तृकरणसंयोगात् क्रिया, कृतस्य कर्मणः फलं नाकृतस्य, नाङ्कुरोत्पत्तिरबीजात्, कर्म- सदृशं फलं नान्यस्माद्बीजादन्यस्योत्पत्तिरिति युक्तिः ॥ ३१ ॥ युक्ति भी है कि—पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, आकाश और चेतना इन छः धातुओं के समुदाय मिलने से गर्भ उत्पन्न होता है और कर्त्ता और करण (साधन) के मिलने से क्रिया उत्पन्न होती है, कर्त्ता आत्मा, करण स्त्री पुरुष उनके संयोग से गर्भाशय रूप क्षेत्र में जन्म होता है । किये हुए ही कर्म का फल होता है, न किये हुए कर्म का फल नहीं होता । जिस प्रकार बिना बीज के अंकुर उत्पन्न नहीं होता वैसे कर्म के अनुसार समान ही फल मिलता है यथा—एक जाति के बीज से दूसरी जाति का फल उत्पन्न नहीं होता ॥ ३१ ॥ एवं प्रमाणैश्चतुर्भिरुपदिष्टे पुनर्भावे धर्मद्वारेष्ववदधीयेत, तद्यथा- गुरुशुश्रूषायामध्ययने व्रतचर्यायां दारक्रियायामपत्योत्पादने भृत्यभरणेऽ- तिथिपूजायां दानेऽनभिध्यायां तपस्यनसुआयां देहवाङ्मानसे कर्मण्य- क्लिष्टे देहेन्द्रिय-मनोऽर्थ-बुद्ध्यात्म-परीक्षायां मनःसमाधाविति, यानि चान्यान्यप्येवंविधानि कर्माणि सतामविगर्हितानि स्वर्ग्याणि वृत्तिपुष्टि- कराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुम् , तथा हि कुर्वन्निह चैव यशो लभते प्रेत्य च स्वर्गमिति तृतीया परलोकैषणा व्याख्याता भवति ॥ ३२ ॥ इस प्रकार आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान और युक्ति चारों प्रमाणों द्वारा पुनर्जन्म के सिद्ध होने पर धर्म-साधन के मार्गों में चित्त लगावे । यथा—गुरु माता, पिता, आचार्य की सेवा, अध्ययन-पठन में, ब्रह्मचर्य काय, मन, वाणी से मैथुन त्याग, ब्रह्मचर्यपालन, विवाह कर्म में, सन्तानोत्पत्ति, आश्रित जन-

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