भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157

अ० ११] सूत्रस्थानम् १३६ के पोषण में, अतिथि सत्कार में, यथाशक्ति दान देने में, दूसरे के धन को न चाहने में, द्वन्द्व सुख-दुःख सहने में, दूसरे के गुणों में दोष न देखने में, शरीर को बिना कष्ट पहुँचाये शरीर, वाणी और मन से कर्म करने में, देहपरीक्षा में, इन्द्रिय परीक्षा, मन परीक्षा, विषय की परीक्षा, ज्ञान की परीक्षा, आत्म परीक्षा, और मन की समाधि ( चित्तवृत्ति-निरोध ) में मन का लगाना ही धर्म मार्ग है। और भी दूसरे इसी प्रकार के कर्म, सज्जनों से अनिन्दत, पूजित, स्वर्ग सुख को देने वाले, जीवन पालन करने वाले हों, उनको करने का उद्योग करे, ऐसा करने पर इहलोक में यश मिलता है और मरने पर स्वर्ग अर्थात् पुनर्जन्म में सुख मिलेगा, इस प्रकार से तीसरी परलोकैषणा भी कह दी ॥ ३२ ॥ अथ खलु त्रय उपस्तम्भाः, त्रिविधं बलम्, त्रीण्यायतनानि, त्रयो रोगाः, त्रयो रोगमार्गाः, त्रिविधा भिषजः, त्रिविधमौषधमिति ॥३३॥ तीन प्रकार के उपस्तम्भ अर्थात् शरीर को धारण करने वाले तत्त्व हैं, तीन प्रकार के बल हैं, तीन कारण हैं। तीन प्रकार के रोग हैं, तीन रोगमार्ग हैं, तीन प्रकार के चिकित्सक हैं, तीन प्रकार की औषध हैं ॥ ३३ ॥ त्रय उपस्तम्भा इति-आहारः, स्वप्नो, ब्रह्मचर्यमिति । एभिस्त्रिभिर्यु- क्तियुक्तैरुपस्तब्धमुपस्तम्भैः शरीरं बलवर्णोपचयोपचितमनुवर्त्तते याव- दायूःसंस्कारात् संस्कारमहितमनुपसेवमानस्य, य इहैवोपदेक्ष्यते ॥३४॥ तीन उपस्तम्भ तत्त्व जो शरीर को धारण करते हैं, आहार, स्वप्न और ब्रह्मचर्य्य हैं। ये तीनों को युक्ति पूर्वक प्रयुक्त करने पर शरीर दृढ़, मजबूत बल, वर्ण, पुष्टि से युक्त होता है, जब तक शरीर में धर्माधर्म आयु के बनाने में कारण रहते हैं। इन तीनों उपस्तम्भों का उचित मात्रा में सेवन करना ही आयु का कारण है। अहित वस्तुओं का सेवन न करना ही आयु में कारण है, उन अहित वस्तुओं को यहीं पर कहेंगे ॥ ३४ ॥ त्रिविधं बलमिति सहजं कालजं युक्तिकृतं च । तत्र सहजं यच्छरी- रसत्त्वयोः प्राकृतम्, कालकृतमृतुविभागजं वयःकृतं च, युक्तिकृतं पुन- स्तद्यदाहारचेष्टायोगजम् ॥ ३५ ॥ तीन प्रकार का बल है-सहज, कालजन्य और युक्तिजन्य, इन में उत्पत्ति समय ही शरीर और मन को गर्भाशय में मिलता है जो बल उसे सहज या प्राकृतिक बल कहते हैं। कालजन्य ऋतुओं के विभागानुसार आहार-विहार के द्वारा और बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था में उत्पन्न बल। यौवनावस्था में बला-

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान) · पृष्ठ 157, कुल 639 में से · BharatKosha