भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१४४ चरकसंहिता [ अ० ११ बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि मानस व्याधि के रहते हुए भी लोभ, काम, क्रोध, मोह के विपरीत, उत्तम बुद्धि से हित और अहित कार्यों का विचार करते हुए, धर्म, अर्थ और काम इनके अहितकारक कार्यों को छोड़ने में, तत्पर, एवं धर्म, अर्थ और काम के लिये हितकारी कार्यों को सेवन करने में प्रयत्नवान् रहना चाहिये । क्योंकि संसार में धर्म अर्थ और काम तीनों के विना मनोज्ञ सुख वा दुःख कुछ भी नहीं होता । इसलिये इन ( धर्म, अर्थ और काम ) के हितकारी कार्यों का ग्रहण और अहितकारी कार्यों का त्याग करने में प्रयत्नशील रहना चाहिये, इस के लिये विद्यावृद्ध पुरुषों का सेवन करना चाहिये । आत्म- ज्ञान, देश-ज्ञान, काल-ज्ञान, बल-ज्ञान, और शक्ति ज्ञान के लिये उचित रीति से प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४५ ॥ भवति चात्र । मानसं प्रति भैषज्यं त्रिवर्गस्यान्ववेक्षणम् । तद्विद्यसेवा विज्ञानमात्मादीनां च सर्वशः ॥ ४६ ॥ इति । और इस प्रसङ्ग में एक श्लोक है औषध धर्म, अर्थ, काम ( त्रिवर्ग ) का सेवन करना, धर्म, अर्थ काम इन को उपदेश करने वाले विद्यावृद्ध पुरुष की सेवा करना, आत्मज्ञान, देश, काल, बल आदि का ज्ञान करना मानस रोगों की औषध है ॥ ४६ ॥ त्रयो रोगमार्गा इति-शाखा, मर्मास्थिसन्धयः, कोष्ठश्च । तत्र शाखा रक्तादयो धातवस्त्वक् च, स बाह्यो रोगमार्गः । मर्माणि पुनर्वस्ति-हृदय- मूर्द्धादीनि, अस्थि-सन्धयोऽस्थि-संयोगाः, तत्रोपनिबद्धाश्च स्नायुकण्डराः, स मध्यमो रोगमार्गः । कोष्ठः पुनरुच्यते महास्रोतः शरीरमध्यं महा- निम्नमामपक्वाशयश्चेति पर्यायशब्दैस्तन्त्रे, स रोगमार्ग आभ्यन्तरः।४७। रोगों के तीन मार्ग हैं, जैसे—( १ ) शाखा, ( २ ) मर्म, अस्थि-सन्धियां और ( ३ ) कोष्ठ । इन में शाखा रक्त आदि छः धातु और त्वचा ये सात बाह्य रोगमार्ग हैं, बस्ति ( मूत्राशय ), हृदय ( दिल ) और शिर, मस्तिष्क एक सौ सात मर्म और अस्थि ( हड्डियां ), सन्धियां ( अस्थियों के जोड़ ), तथा इन में बंधी हुई स्नायु और कण्डरायें ये 'मध्यम रोगमार्ग' हैं, यह दूसरा मार्ग है । शरीर के बीच में, बड़ा भारी स्रोत, बड़े भारी गड्ढे के तुल्य है, इस को आमाशय या पक्वाशय के नाम से कहते हैं, यह तीसरा 'आभ्यन्तर रोगमार्ग' है ॥ ४७ ॥ तत्रगण्ड-पिडकाऽपची-चर्म-कीलाधि-मांस-मशक-कुष्ठ-व्यङ्गाद- विकारा बहिर्मार्गजाश्च वीसर्प-श्वयथु-गुल्मार्शो-विद्रध्यादयः शाखानु सारिणो भवन्ति रोगाः ॥ ४८ ॥