चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० चरकसंहिता [ अ० १२
नाह, एतान्येव वातप्रकोपप्रशमनानि भवन्ति, यथा ह्येनमसंघातनमव- स्थितमनासाद्य प्रकोपप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा, तथाऽनु- व्याख्यास्यामः। वातप्रकोपनानि खलु रूक्ष-लघु-शीत-दारुण-खर-विशद- शुषिर-कराणि शरीराणाम्, तथाविधेषु शरीरेषु वायुराश्रयं, गत्वाऽऽप्या- य्यमानः प्रकोपमापद्यते, वातप्रशमनानि पुनः स्निग्ध-गुरूष्ण-श्लक्ष्ण- मृदु-पिच्छिल-घन-कराणि शरीराणाम्, तथाविधेषु शरीरेषु वायुरसञ्ज्य- मानश्चरन् प्रशान्तिमापद्यते ॥ ७ ॥
कांकायन ऋषि के वचन सुनकर बडिश धामार्गव बोले—आपने जो कहा सो ठीक ही कहा है। ये ही आपके कहे हुए कारण वायु को कुपित और शान्त करने वाले होते हैं। जिस प्रकार कि इस सूक्ष्म एवं निरन्तर गतिशील वायु को प्राप्त करके ये रूक्ष आदि गुण इस वायु को कुपित करते हैं, तथा शान्त करते हैं इसकी व्याख्या करेंगे। वात को कुपित करने वाले द्रव्य शरीर को रूक्ष लघु ठण्डा दारुण (कठिन) खरखरा विशद (जो चिपचिपा न हो) और छिद्र युक्त कर देते हैं। रूक्ष लघु आदि शरीर में आश्रय पाकर संचित हुआ वायु प्रकुपित हो जाता है। वात को शान्त करने वाले द्रव्य एवं कर्म शरीर को स्निग्ध, गुरु, उष्ण (गरम), श्लक्ष्ण, मृदु (कोमल), चिपचिपा, तथा गाढ़ा कर देते हैं। इस प्रकार के शरीर में संचार करता हुआ वायु आश्रय न पाकर शान्त हो जाता है॥ ७॥
तच्छ्रुत्वा बडिशवचनमवितथमृषिगणैरनुमतमुवाच वार्योविदो राजर्षिः-एवमेतत्सर्वमनपवादं यथा भगवानाह, यानि तु खलु वायोः कुपिताकुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि बहिः शरीरेभ्यो वा भवन्ति, तेषामवयवान् प्रत्यक्षानुमानोपमानैः साध- यित्वा नमस्कृत्य वायवे यथाशक्ति प्रवक्ष्यामः, वायुस्तन्त्र-यन्त्रधरः, प्राणोदान-समान-व्यानापानात्मा, प्रवर्तकश्चेष्टानामुच्चावचानां, नियन्ता प्रणेता च मनसः, सर्वेन्द्रियाणामुद्योजकः, सर्वेन्द्रियार्थानामभिवोढा, सर्व-शरीर-धातु-व्यूह-करः, सन्धानकरः शरीरस्य, प्रवर्तको वाचः, प्रकृतिः स्पर्श-शब्दयोः, श्रोत्रस्पर्शनयोर्मूलं, हर्षोत्साहयोर्योनिः, समीरणोऽग्नेः, दोषसंशोषणः, क्षेप्ता बहिर्मलानां, स्थूलाणुस्रोतसां भेत्ता, कर्ता गर्भा- कृतीनाम्, आयुषोऽनुवृत्ति-प्रत्यय-भूतो भवत्यकुपितः। कुपितस्तु खलु शरीरे शरीरं नानाविधैर्विकारैरुपतपति बलवर्ण-सुखायुषामुपघाताय, मनो व्याहर्षयति, सर्वेन्द्रियाण्युपहन्ति, विनिहन्ति गर्भान् विकृतिमा-