चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ चरकसंहिता [ अ० १३ वाले, खाली पेट रहने से जिनके पेट में दर्द होने लगता है, मन्दाग्नि, निर्बल जाठराग्नि वाले, जिनको ज्वर, अतीसार, कास पुराना बहुत दिनों का हो, और निर्बल, अल्प शारीरिक बल वाले व्यक्ति स्नेह की ह्रस्व मात्रा लेवें । यह मात्रा जीर्ण होने में सरल है, सुखपूर्वक पच जाती है । शरीर को चिकना करती एवं बल बढ़ाती है । पुरुषत्वकारक, बलकारक, निरापद, एवं देर तक सेवन व्यवहार में लाई जा सकती है ॥ ३८-४० ॥ कौनसा स्नेह किस के लिये हितकारी है— वात-पित्त-प्रकृतयो वात-पित्त-विकारिणः । चक्षुष्कामाः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ ४१ ॥ आयुःप्रकर्षकामाश्च बल-वर्ण-स्वराथिनः । पुष्टिकामाः प्रजाकामाः सौकुमार्यार्थिनश्च ये ॥ ४२ ॥ दीप्त्योजः-स्मृति-मेधाग्नि-बुद्धीन्द्रिय-बलार्थिनः । पिबेयुः सर्पिरातश्च दाह-शस्त्र-विषाग्निभिः ॥ ४३ ॥ जिनकी प्रकृति वात-पित्त हो, वात-पित्त के रोगी, उत्तम दृष्टि चाहने वाले. उरःक्षत रोग से क्षीण, निर्बल, वृद्ध, बालक, निर्बल मनुष्य, आयु की वृद्धि की कामना करने वाले, बल, वर्ण, कान्ति, स्वर को चाहने वाले, शरीर पुष्टि के इच्छुक, संतति की चाह वाले, सुकुमारता, कोमलता के इच्छुक, तेज, ओज, स्मृति, बुद्धि, अग्नि, धारण करने की शक्ति और इन्द्रिय बल को चाहने वाले और आग, जल, शस्त्र, विष से आक्रान्त रोगी घी का सेवन करें ॥ ४१-४३ ॥ प्रवृद्ध-श्लेष्म-मेदस्काश्चल-स्थूल-गलोदराः । वात-व्याधिभिराविष्टा वात-प्रकृतयश्च ये ॥ ४४ ॥ बलं तनुत्वं लघुतां दृढतां स्थिरगात्रताम् । स्निग्ध-श्लक्ष्ण-तनुत्वक्त्वं ये च काङ्क्षन्ति देहिनः ॥ ४५ ॥ कृमिकोष्ठाः क्रूरकोष्ठास्तथा नाडीभिरर्दिताः । पिबेयुः शीतले काले तैलं तैलोचिताश्च ये ॥ ४६ ॥ जिनमें कफ की या चर्बी की अधिकता हो, जिनका पेट या गर्दन मोटी और ढीली हो, वात रोगों से पीड़ित, वात प्रकृति के, जो बल, पतलापन, हलकापन, मजबूती, शरीर की स्थिरता ( संघटन ), चिकनापन, और त्वचा की कोमलता चाहते हैं, कृमिरोग से आक्रान्त, क्रूर कोष्ठ वाले ( जिनको तीव्र विरेचन से प्रभाव होता है ), नाड़ीव्रण से आक्रान्त और जिनको तैल सेवन