भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१६४ चरकसंहिता [ अ० १३ रूक्षप्रकृति, वातरोगी, नित्य व्यायामसेवी, नित्य मद्यसेवी, नित्य स्त्रीसेवी, और जो चिन्ता (शोक) करते रहते हैं; वे व्यक्ति स्नेहन के योग्य हैं ॥ ५२ ॥ स्नेह के अयोग्य व्यक्ति— संशोधनार्हते येषां रूक्षणं संप्रवक्ष्यते । न तेषां स्नेहनं शस्तमुत्सन्न-कफ-मेदसाम् ॥ ५३ ॥ अभिष्यण्यानन गुदा नित्यं मन्दाग्नयश्च ये । तृष्णा मूर्च्छा-परीताश्च गर्भिण्यस्तालु-शोषिणः ॥ ५४ ॥ अन्नद्विषश्छर्दयन्तो जठरामय-गरादिताः । दुर्बलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहम्लाना मदातुराः ॥ ५५ ॥ न स्नेह्या वर्तमानेषु न नस्तावस्तिकर्मसु । स्नेहपानात्प्रजायन्ते तेषां रोगाः सुदारुणाः ॥ ५६ ॥ संशोधन किये बिना जिनका रूक्षण करना कहा जायेगा; उनको; जिनका कफ और मेद बढ़ा हो, जिनके नाक, मुख और गुदा से स्राव होता हो, जिनको सदा मन्दाग्नि रहती हो, प्यास और मूर्च्छा से आक्रान्त, गर्भवती, तालुकण्ठ जिनका सूखता हो; भोजन से अरुचि करने वाले, वमन करते हुए, उदर रोगी या विष से आक्रान्त, दुर्बल, ग्लानि करने वाले (कच्चे दिल के, घृणा करने की प्रकृति के), स्नेह के पीने में जो प्रसन्न नहीं होते, घृणा करते हैं और मद (नशे) से ग्रस्त व्यक्तियों को और नस्य कर्म एवं अनुवासन बस्ति जिन्होंने ली हो उनको स्नेहन नहीं देना चाहिये । यदि इनको स्नेह पिलाया जायगा तो भयानक रोग उत्पन्न हो जायेंगे । रूक्षण के योग्य—'अभिष्यन्दा महादोषा मर्मस्था व्याधयश्च ये । ऊरुस्तम्भ-प्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः' ॥ ५३-५६ ॥ अस्निग्ध, स्निग्ध और अतिस्निग्ध के लक्षण— पुरीषं ग्रथितं रूक्षं, वायुरप्रगुणो, मृदुः । पक्ता, खरत्वं रौक्ष्यं च गात्रस्यास्निग्धलक्षणम् ॥ ५७ ॥ जिसका मल बंधा हुआ, रूक्षता वायु अपनी प्रकृति में न हो, जाठराग्नि मन्द हो, शरीर में कर्कशता रूखापन हो, तो समझे कि स्नेहन-क्रिया ठीक नहीं हुई ॥ ५७ ॥ वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् । मार्दवं स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते ॥ ५८ ॥ वायु की अनुकूलता, जाठराग्नि का बढ़ना (भूख का लगना), मल