भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 194

१७६ चरकसंहिता [अ० १४

गो-खरोष्ट्रवराहाश्व-शकृद्भिः सतुषैर्यवैः । सिकता-पांशु-पाषाण-करीषायस-पूटकैः ॥ २६ ॥ श्लैष्मिकान् स्वेदयेत् पूर्वैर्वातिकान् ममुपाचरेत् । द्रव्याण्येतानि शम्यन्ते यथास्वं प्रस्तरेष्वपि ॥ २७ ॥ भूगृहेषु च जेन्ताकेपूष्णगर्भ गृहेषु च । विधूमाङ्गारतप्तष्वभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ २८ ॥ तिल, उड़द, कुलथी, अम्ल (चांगेरी-चोपनिया), घृत, तैल, ओदन- पके हुए चावल, खीर (मात्रा-दूध का खोया), (तिल और मांस की खिचड़ी), माछ, इन पदार्थों को गोलकार बना कर 'पिण्ड स्वेद' का प्रयोग करना चाहिये । रूक्ष स्वेद के द्रव्य—गाय का गोबर, गधे का मल, ऊँट का मल, सुअर का मल और घोड़े की लाँद, छिलकों वाले जौ, रेता, पांशु (धूली- बारीक रेत), पत्थर (ईंट का) चूरा, छाना (अरना) का चूर, आयस- लोहे का चूरा, इनका पोटली बनाकर कफ रोगियों को स्वेद देना चाहिये और तिल, उड़द आदि से वातरोगियों को स्वेद देना चाहिये । पिण्ड स्वेद को 'संकर स्वेद' कहते हैं । ये तिल आदि पदार्थ प्रस्तर स्वेद में भी प्रशस्त हैं । नाड़ी स्वेद—भूमि को खोद कर बनाया हुआ घर, जेन्ताक अर्थात् कृत्रिम विधि से गरम किया हुआ घर, उष्ण गर्म अर्थात् हमाम-बिना खिड़की के घर, इनमें, वातहर, या कफहर लकड़ियों को जलाकर, धुवें रहित अंगारों से इन घरों को गरम करके, शरीर का स्नेहन करने के पीछे मनुष्य सुखपूर्वक स्वेद ले सकता है ॥२५-२८॥ ग्राम्यानूपौदकं मांसं पयो बस्तशिरस्तथा । वराह-मध्य-पित्तासृक् स्नेहवत्तिल-तण्डुलाः ॥ २९ ॥ इत्येतानि समुत्क्वाथ्य नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् । देश-काल-विभागज्ञा युक्त्यपेक्षा भिषक्तमः ॥ ३० ॥ वारुणामृतकेरण्ड-शिग्रु-मूलक-सर्षपैः । वासा-वंश-करञ्जार्क-पत्रैरश्मन्तकस्य च ॥ ३१ ॥ शोभाञ्जनक-शैरेय-मालती-सुरसार्जकैः । पत्रैरुत्क्वाथ्य सलिलं नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥ भूतीक-पञ्चमूलाभ्यां सुरया दधिमस्तुना । मूत्रैरम्लैश्च सस्नेहैर्नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥ एत एव च निर्यूहाः प्रयोज्या जलकोष्ठके ।