चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 639 में से
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१६२ चरकसंहिता [ अ० १५ अयोग, सम्यक् योग और अतियोग के विशेष लक्षण ये हैं । जैसे किसी विशेष कारण से ( गले में अंगुली आदि डालने से भी वमन का थोड़ा आना अथवा, वमनकारक औषध ही का केवल बाहर आना,) वेगों का रुक जाना ये अयोग के चिन्ह हैं । न तो बहुत जल्दी और न देर में ठीक समय पर वमन का आना; वमन करने में कष्ट का अधिक न होना, क्रम से पहले कफ, फिर पित्त और अन्त में वायु इन दोषों का बाहर आना; और वमन का अपने आप रुक जाना सम्यक् योग के लक्षण हैं । सम्यक् योग में दोषों के प्रमाणों के अनुसार तीक्ष्ण, मृदु और मध्य भाग होते हैं । वमन के अतियोग से झागदार, रक्तमिश्रित, चन्द्रिका का आना ये अतियोग के लक्षण हैं । अतियोग और अयोग से होने वाले उपद्रवों को जानना चाहिये । अफारा, गुदा में काटने के समान पीड़ा होना, स्राव होना, हृदय का बाहर आना, अर्थात् कलेजे का मुख को आना ( आमाशय का बाहर आना सा प्रतीत होना ), अंगों में वेदना और जकड़ना, रक्त का बाहर निकलना, शरीर का विभ्रम ( चक्कर आना ), शरीर की जड़ता, शरीर में थकान, उदासी का होना, ये अयोग और अतियोग के उपद्रव हैं ॥ १५ ॥ योगेन तु खल्वेनं छर्दितवन्तमभिसमीक्ष्य सुप्रक्षालित-पाणि-पादास्यं मुहूर्तमाश्वास्य, स्नैहिकवैरेचनिकोपशमनीयानां धूमानामन्यतमं साम- र्थ्यतः पाययित्वा, पुनरेवोदकमुपस्पर्शयेत् ॥ १६ ॥ उपस्पृष्टोदकं चैनं निवातमागारमनुप्रवेश्य संवेश्य चानुशिष्यात्— उच्चैर्भाष्यमत्यासनमतिस्थानमतिचङ्क्रमणं क्रोध-शोक-हिमातपावश्याया- तिप्रवातान् यानयानं ग्राम्यधर्ममस्वप्नं निशि दिवा स्वप्नं विरुद्धाजी- र्णासात्म्याकालप्रमितातिहीन-गुरु-विषम-भोजन-वेग-सन्धारणोदीरण- मिति भावानेतान् मनसाऽप्यसेवमानः सर्वमाहारमद्यात्-इति । स तथा कुर्यात् ॥ १७ ॥ सम्यक् योग से वमन कर चुकने पर रोगी को देखकर उसके हाथ पांव, मुख धुलवा कर थोड़ी देर विश्राम लेने दे । इसके पीछे स्नैहिक, वैरेचनिक या उपशमनीय कोई एक प्रकार का धूम यथाशक्ति पिलाकर फिर पानी से हाथ पांव धुला देवे । पानी से मुंह हाथ धुलाकर वमन किये पुरुष को वायुरहित— सीधी वायु जिसमें न आ सके, एक पार्श्व से आये, ऐसे घर में लेजा कर लेटा दे और निम्न आदेश करे—ऊंचा बोलना, बहुत देर बैठना, बहुत सोना, बहुत चलना-फिरना, क्रोध, शोक, ठण्डक, धूप, ओस, वायु में अधिक बैठना, घोड़े आदि की सवारी अधिक करना, मैथुन, रात में जागना, दिन में सोना,