भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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शील काल के नाश के कारण की तरह नाश के कारण के अभाव से पदार्थों के नाश का कारण नहीं जाना जाता। कोई भी पदार्थ जैसा उत्पन्न होता है, वैसा ही शीघ्रगामी होने से नष्ट होता है। उनके विनाश में कोई कारण नहीं है। उनमें किसी संस्कार का आधान नहीं किया जा सकता। पदार्थों के नाश होने के कारण का पता नहीं चलता क्योंकि नाश के कारण का ही अभाव है। जैसे नित्य काल का भी नाश होता दिखाई देता है, परन्तु इस नाश के कारण का पता नहीं चलता, क्योंकि यह काल बहुत शीघ्रगामी है। धातु पदार्थ भी काल के समान बहुत शीघ्रगामी हैं इसलिये इनके नाश का कारण न होने से ही अज्ञात है। धातुओं की पूर्वावस्था के निरोध में भी कोई कारण नहीं है। जिन क्रियाओं के द्वारा शरीर के अन्दर विषम हुए धातु समानावस्था में आते हैं, उन क्रियाओं को रोगों की चिकित्सा कहते हैं, यह 'चिकित्सा' वैद्यों का कर्म है। शरीर के अन्दर धातुओं में विषमता उत्पन्न न हो और समान अवस्था में ही धातु सदा बने रहें, इसलिये चिकित्सा क्रिया की जाती हैं। काल, बुद्धि, इन्द्रियार्थों के अतियोग, अयोग या मिथ्यायोग इन विषम हेतुओं के छोड़ने से, समयोग रूप में कारणों के सेवन करने से धातु विषम नहीं होते, और विषम हुए धातु समान हो जाते हैं। चिकित्सा-कुशल वैद्य समान कारणों से धातुओं को समान बनाने का यत्न करें। इस प्रकार करने से वैद्य शरीर के सुख और आयुष्य अर्थात् दीर्घायु को प्रदान करता है। मनुष्य को शारीरिक सुख और आयुष्य प्रदान करने से वैद्य इहलोक एवं परलोक दोनों लोकों में धर्म, अर्थ और काम ( त्रिवर्ग ) को देने वाला होता है ॥ ३१-३८ ॥ तत्र श्लोकाः—चिकित्साप्राभृतगुणो दोषो यश्चेतराश्रयः । योगायोगातियोगानां लक्षणं शुद्धिसंश्रयम् ॥ ३६ ॥ बहुदोषस्य लिङ्गानि संशोधनगुणाश्च ये । चिकित्सासूत्रमात्रं च सिद्धि-व्यापत्ति-संश्रयम् ॥ ४० ॥ या च युक्तिश्चिकित्सायां यं चार्थं कुरुते भिषक् । चिकित्साप्राभृतेऽध्याये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ४१ ॥ चिकित्साप्राभृत में वैद्य के गुण; वैद्य के विपरीत मूढ वैद्य के अवगुण, संशोधन के सम्यकयोग और अतियोग के लक्षण; बहुत दोषों के लक्षण, संशोधन के गुण, चिकित्सा का सूत्र रूप, चिकित्सा के युक्तियुक्त होने में शंका-समाधान;