चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०५ हुआ प्रतीत होता है, शिर की सन्धियां फटती प्रतीत होती हैं, शिराओं के अन्दर धड़कन विशेष ( स्पन्दन ) रूप से प्रतीत होती है, गर्दन जड़ बन जाती है, इधर-उधर नहीं हिलाई जा सकती और स्निग्ध और उष्ण क्रिया आराम देत प्रतीत होतो है । ये वातजन्य शिरोरोग के लक्षण हैं ॥१६-२१॥ कट्वम्ल-लवण-क्षार-मद्य-क्रोधातपानलैः ॥ २२ ॥ पित्तं शिरसि संदुष्टं शिरोरोगाय कल्पते । दह्यते रुज्यते तेन शिरः शीतं सुपूयते ॥ २३॥ दह्येते चक्षुषी तृष्णा भ्रमः स्वेदश्च जायते । आस्यासुखैः स्वप्नसुखैर्गुरु-स्निग्धातिभोजनैः ॥ २४ ॥ श्लेष्मा शिरसि संदुष्टः शिरोरोगाय कल्पते । शिरो मन्दरुजं तेन सुप्रस्तिमितभारिकम् ॥ २५ ॥ भवत्युत्पद्यते तन्द्रा तथाऽऽलस्यमरोचकम् । वाताच्छूलं भ्रमः कम्पः पित्ताद्दाहो मदस्तृषा ॥ २६ ॥ कफाद् गुरुत्वं तन्द्रा च शिरोरोगे त्रिदोषजे । तिल-क्षीर-गुडाजीर्ण-पूति-संकीर्ण-भोजनात् ॥ २७॥ क्लेदोऽसृक्कफ-मांसानां दोषमस्योपजायते । ततः शिरसि संक्लेदात्क्रिमयः पापकर्मणः ॥ २८॥ जनयन्ति शिरोरोगं जाता बीभत्सलक्षणम् । व्यथच्छेद-रुजा-कण्डू-शोफ-दौर्गन्ध्य-दुःखितम् ॥ २६ ॥ क्रिमिरोगातुरं विद्यात्क्रिमीणां लक्षणेन च । पित्तजन्य शिरोरोग—कडुवे, खट्टे, नमकीन, क्षार पदार्थों के सेवन से, शराब के पीने से, क्रोध से, धूप से, आग से, पित्त शिर में कुपित होकर शिरोरोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर में जलन और पीड़ा होती है, तथा शीत उपचार अनुकूल पड़ता है । आंखें जलती हैं, प्यास होती है, चक्कर आता है, और पसीना आता है । कफजन्य शिरोरोग में निरुद्योगी आलस्य का सुख- मय जीवन व्यतीत करना, दिन में सोना, गुरु, भारी और स्निग्ध घी आदि युक्त पदार्थों के अतिभोजन से; श्लेष्मा अर्थात् कफ शिर में कुपित होकर शिरो- रोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर में धीमी २ वेदना होती है, शिर सोया हुआ सा प्रतीत होता है, शिर जड़ हो जाता है, भारी हो जाता है । तन्द्रा, कार्य में अनिच्छा, आलस्य और भोजन में अरुचि उत्पन्न हो जाती है । त्रिदोषजन्य शिरोरोग— वात के कारण चक्कर आना और कम्पन, पित्त के कारण जलन, मूर्च्छा और प्यास, कफ के कारण भारीपन, और तन्द्रा, त्रिदोष जन्य शिरोरोग