चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १७ ] सूत्रस्थानम् २१६ और विद्रधि ये पित्त की अधिकता से होती हैं और ये साध्य हैं, ये थोड़ी चर्बीवालों में होती हैं। जिस प्रमेह रोगी के मर्म (हृदय, बस्ति, और नाभि) में, कन्धे, गुदा, हाथ, स्तन, सन्धियों और पांव में पिड़कायें उत्पन्न होती हैं, वह प्रमेह का रोगी नहीं बचता। इसी प्रकार अन्य दूसरी और भी पिड़कायें हैं जो लाल, पीली, काली, पाण्डुर (धूसर) पीले रंग की, राख अर्थात् भस्म के समान; काले बालों की छाया जैसी, कुछ मृदु, कुछ कठिन, कुछ बड़ी, कुछ छोटी, कुछ मन्द वेग, कुछ तीव्र वेग, कोई थोड़ी वेदनावाली, कोई बहुत दर्दवाली होती हैं। इन वात, पित्त, कफ की विद्रधियों को इनके अपने-अपने लक्षणों से पहिचान कर उपद्रवों के उत्पन्न होने से पूर्व ही चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १०३-१०९ ॥ तृट्-श्वास-मांस-संकोथ-मोह-हिक्का-मद-ज्वराः । वीसर्प-मर्म-संरोधाः पिडकानामुपद्रवाः ॥ ११० ॥ उपद्रव—प्यास, श्वास, मांस का संकोच, मूर्च्छा, हिचकी, मद और ज्वर, वीसर्प, और हृदय आदि मर्म का अवरोध, ये पिडकाओं के उपद्रव हैं ॥ ११० ॥ क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च दोषाणां त्रिविधा गतिः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक् च विज्ञेया त्रिविधाऽपरा ॥ १११ ॥ इत्युक्ता विधिभेदेन दोषाणां त्रिविधा गतिः । त्रिविधा चापरा कोष्ठ-शाखा-मर्मास्थि-सन्धिषु ॥ ११२ ॥ चय-प्रकोप-प्रशमाः पित्तादीनां यथाक्रमम् । भवन्त्येकैकशः षट्सु कालेष्वभ्रागमादिषु ॥ ११३ ॥ गतिः कालकृता चैषा चयाद्या पुनरुच्यते । गतिश्च द्विविधा दृष्टा प्राकृती वैकृती च या ॥ ११ ॥ पित्तादेवोष्मणः पक्तिर्नराणामुपजायते । तच्च पित्तं प्रकुपितं विकारान् कुरुते बहून् ॥ ११५ ॥ प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते । स चैवौजः स्मृतः काये स च पाप्मोपदिश्यते ॥ ११६ ॥ सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः । तेनैव रोगा जायन्ते तेन चोपरुध्यते ॥ ११७ ॥ नित्यसंनिहितामित्रं समीक्ष्याऽऽत्मानमात्मवान् । नित्यं युक्तः परिचरेदिच्छन्नायुरनित्वरम् ॥ ११८ ॥ दोषों की गति तीन प्रकार की होती है—क्षय (घटना), स्थान (सम रहना), और वृद्धि (बढ़ना), अथवा (ऊर्ध्व) ऊपर जाना, (अधः) नीचे जाना और (तिर्यक्), तिरछा जाना ये दूसरी प्रकार की दोषों की गति हैं। विधि