भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 639 में से

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पृष्ठ 238

२२० चरकसंहितः [ अ० १७ भेद से दोषों की तीन प्रकार की गति कह दी, एक और प्रकार से भी तीन प्रकार की गति होती है यथा—कोष्ठ, शाखा, एवं मर्मास्थि और सन्धि इनमें दोषों का संचय, प्रकोप और शमन यह तीन प्रकार की गति हैं। यथा--छः ऋतुओं में एक-एक दोष की तीनों जातियां होती हैं। यथा—वर्षा ऋतु में पित्त का संचय, शरद् ऋतु में प्रकोप और हेमन्त में शान्ति। ग्रीष्म में वायु का संचय, वर्षा में प्रकोप तथा शरद् में शान्ति। हेमन्त में कफ का संचय वसन्त में प्रकोप और ग्रीष्म में कफ की शान्ति होती है। दोषों के संचय आदि की गति दो प्रकार की है। यथा—प्राकृत और वैकृत। पित्त का वर्षा ऋतु में संचय होना प्राकृत गति है और वसन्त में संचय होना वैकृत गति है। इसी प्रकार कफ का हेमन्त में संचय होना प्राकृत और वर्षा में संचय होना वैकृत है, वायु का ग्रीष्म ऋतु में संचय होना प्राकृत और शरद् में संचय होना वैकृत है। प्राकृत-स्वास्थ्यावस्था, वैकृत रुग्णावस्था है, इस प्रकार से पित्त आदि दोषों की भी दो प्रकार की गति है। मनुष्यों का पाचन पित्त की ही गरमी से होता है और वह पित्त विकृत होकर बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। प्राकृत स्वास्थ्यावस्था में स्थित कफ शरीर का बल, और ओजरूप होता है, परन्तु यही विकृत, रुग्णावस्था में मल और पाप्मा अर्थात् पापरोग उत्पन्न करता है। वायु के कारण ही शरीर की सब चेष्टाएं, क्रियायें होती हैं। यही वायु प्राणियों का प्राण है। इस के विकृत होने पर रोग उत्पन्न होते हैं, और इन्हीं रोगों से इसी विकृत वायु से मनुष्य मर जाता है। मनुष्य को चाहिये कि वह समझ ले कि शत्रु (वैकृत, पित्त, वायु, कफ ये दोष ) सदा समीप में खड़े हैं, इसलिये अपने कल्याण में मन को लगाकर प्रशस्त मन से परीक्षा करके नित्य ही न जानेवाली दीर्घ आयु की सदा इच्छा करता हुआ दीर्घायु होने का प्रयत्न करे । १११-११८। तत्र श्लोकौ । शिरोरोगाः सहहृद्रोगा रोगा मानविकल्पजाः । क्षयाः सपिडकाश्चोक्ता दोषाणां गतिरेव च ॥ ११९ ॥ कियन्तःशिरसीयेऽस्मिन्नध्याये तत्त्वदर्शिना । ज्ञानार्थं भिषजां चैव प्रजानां च हितैषिणा ॥ १२० ॥ शिरोरोग, हृदय के रोग, दोषों के परिमाण भेद से होनेवाले रोग, दोषों के क्षय से, पिड़कायें, दोषों की गति, इन सब बातों का तत्त्वदर्शी महर्षि ने 'कियन्तःशिरसीय' अध्याय में, वैद्यों के ज्ञान और प्रजाओं की मंगलकामना से उपदेश किया है ॥ ११९-१२० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के कियन्तःशिरसीयो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

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