चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें७३० चरकसंहिता [ अ० १९ प्रकार के ग्रहणी रोग, चार प्रकार के मद्ररोग, चार प्रकार की मूर्छा, चार प्रकार के शोष, चार प्रकार की क्लीबता तीन प्रकार का शोथ, तीन प्रकार का किलास, तीन प्रकार का रक्तपित्त, दो प्रकार का ज्वर, दो प्रकार के व्रण, दो प्रकार के आयाम, दो प्रकार की गृध्रसी, दो प्रकार का कामला, दो प्रकार की आम, दो प्रकार का वातरक्त, दो प्रकार का अर्श । एक प्रकार का अस्तम्भ, एक प्रकार का संन्यास, एक प्रकार का महामद; बीस प्रकार के कृमिभेद, बीस प्रकार के प्रमेह, बीस प्रकार के योनि रोग, इस प्रकार से इस स्थूल संग्रह में अड़तालीस प्रकार के रोगों की गणना है ॥ ३ ॥ इन को स्पष्ट करके कहते हैं— एतानि यथोद्देशमभिनिर्देश्यामः—अष्टावुदराणीति वात-पित्त-कफ- सन्निपात प्लीह-बद्ध-च्छिद्र-दकोदराणीति, अष्टौ मूत्राघाता इति वात- पित्त-कफ-सन्निपाताश्मरी-शर्कर-शुक्र-शोणितजा इति, अष्टौ क्षीरदोषा इति वैवर्ण्यं वैगन्ध्यं वैरस्यं पैच्छिल्यं फेनसङ्घातो रौक्ष्यं गौरवमति- स्नेहश्चेति, अष्टौ रेतोदोषा इति—तनु शुष्कं फेनिलमश्वेतं पूत्यतिपिच्छिल- मन्यधातूपहितमवसादि चेति ॥ ( १ ) ॥ आठ प्रकार के उदर रोग हैं—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य प्लीहोदर, बद्धोदर, छिद्रोदर और दकोदर ये आठ । आठ मूत्राघात—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य, अश्मरीजन्य, शर्कराजन्य, शुक्रजन्य और शोणितजन्य । स्त्रियों के दूध में आठ प्रकार के दोष हैं—वैवर्ण्य, वैगन्ध्य, वैरस्य, पैच्छिल्य, फेनसङ्घात ( झाग का बहुत आना ), रौक्ष्य ( रूखापन ), गौरव ( भारीपन पानी में नीचे बैठना ) और अति स्नेह ( चिकनाई की अधिकता ) वीर्य के दोष आठ हैं—तनु ( पतला ), शुष्क, फेनिल ( झागदार ), अश्वेत ( मैला, धूसर रंग ), पूति ( दुर्गन्धयुक्त ), अति पिच्छिल ( बहुत चिकना ), अन्य धातु से मिश्रित और अवसादि ( हीनसत्त्व ) ॥ (१) ॥ सप्त कुष्ठानीति कपालोदुम्बर-मण्डलर्ष्यजिह्व-पुण्डरीक-सिध्म-काक- णकानीति, सप्त पिडका इति शराविका कच्छपिका जालिनी सर्षप्यलजी विनता विद्रधिश्चेति, सप्त वीसर्पा इति वात-पित्त-कफाग्नि-कर्दम-ग्रन्थि- सन्निपाताख्याः ॥ ( २ ) ॥ सात प्रकार के कुष्ठ—कपाल, उदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक, सिध्म और काकणिका । सात पिड़कायें—शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्षपी, अलजी, विनता और विद्रधि । सात विसर्प—वातजन्य, पित्त जन्य, कफजन्य, अग्नि, कर्दमक, ग्रन्थि और सन्निपातजन्य ॥ (२) ॥