भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १६ ] सूत्रस्थानम् २३३ षडतीसारा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-भय-शोकजाः, षडुदावर्ता इति वात-मूत्र-पुरीष शुक्र-च्छर्दि-क्षवथुजाः ॥ ( ३ ) ॥ छः अतीसार हैं—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य, भयजन्य और शोकजन्य । छः उदावर्त्त हैं—वातजन्य, मूत्रजन्य, पुरीषजन्य, शुक्रजन्य, छर्दिजन्य और क्षवथुजन्य ॥ ( ३ ) ॥ पञ्च गुल्मा इति वात-पित्त-कफ सन्निपात-रक्तजाः । पञ्च प्लीहदोषा इति गुल्मैर्व्याख्याताः । पञ्च कासा इति वात-पित्त-कफ-क्षत-क्षयजाः, पञ्च श्वासा इति महोर्ध्व-च्छिन्न-तमक-क्षुद्राः । पञ्च हिक्का इति महती गम्भीरा व्यपेता क्षुद्रा चान्नजा च । पञ्च तृष्णा इति वात-पित्ताम-क्षयोपस- र्गात्मिकाः । पञ्च छर्दय इति द्विष्टार्थसंयोग-वात-पित्त-कफ-सन्निपातो- त्रेकात्मिकाः । पञ्च भक्तस्यानशनस्थानानीति वात-पित्त-कफ-द्वेषायासाः, पञ्च शिरोरोगा इति पूर्वोद्देशमभिसमस्य वात-पित्त-कफ-सन्निपात- क्रिमिजाः । पञ्च हृद्रोगा इति शिरोरोगैर्व्याख्याताः । पञ्च पाण्डुरोगा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-मृद्भक्षणजाः । पञ्चोन्मादा इति वात- पित्त-कफ-सन्निपातागन्तुनिमित्ताः ॥ ( ४ ) ॥ पांच गुल्म हैं—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य और रक्त ( आर्त्तव ) जन्य । पांच प्रकार के प्लीहा दोष—गुल्म के समान ( वात, पित्त, कफ, सन्निपात और रक्तजन्य ) हैं। पांच प्रकार के कास-वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, क्षत ( उरः क्षत ) जन्य और क्षयजन्य । पांच प्रकार के श्वास— महा, ऊर्ध्व, छिन्न, तमक और क्षुद्र । पांच प्रकार की हिक्का ( हिचकी )— महती, गम्भीरा, व्यपेता, क्षुद्रा और अन्नजन्य । पांच प्रकार की प्यास (तृषा)— वातजन्य, पित्तजन्य, आमजन्य, क्षयजन्य और औपसर्गिक कारण से होने वाली । वमन भी पांच प्रकार का है—दूषित अन्न के खाने से, वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य और सन्निपात से होने वाला । पांच प्रकार का अपचन— वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, द्वेष ( भोजन से द्वेष ) और आयास ( भोजन के पीछे सहसा श्रम करने से ) । पांच प्रकार के शिरोरोग—( 'अर्द्धावभेदको वा स्यात्' से आरम्भ करके 'कियन्तः शिरसीय' अध्याय में कह दिये गये हैं )। वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य और कृमिजन्य । पांच प्रकार के हृदय रोग—शिरोरोग की भांति हैं। पांच पाण्डुरोग— वातजन्य, पित्तजन्य, कफ- जन्य, सन्निपातजन्य और मिट्टी के खाने से उत्पन्न । पांच प्रकार का उन्माद- वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपात और आगन्तुक कारण से ॥ ( ४ ) ॥