भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

अ० १९ ] सूत्रस्थानम् २३५ प्रकार का-गम्भीर और उत्तान ( त्वचा के पृष्ठवृत्ति ), अर्श दो प्रकार के— शुष्क और आर्द्र ॥ ७ ॥ एक ऊरुस्तम्भ इति आमत्रिदोषसमुत्थानः, एकः संन्यास इति त्रिदोषात्मको मनःशरीराधिष्ठानसमुत्थः, एको महागद इति अतत्त्वा- भिनिवेशः ॥ ( ८ ) ॥ ऊरुस्तम्भ एक प्रकार का—आम-दोषमिश्रित त्रिदोष जन्य । संन्यास एक प्रकार का त्रिदोषजन्य, मन और शरीर में आश्रित । महागद एक प्रकार का अतत्त्वाभिनिवेश अर्थात् यथार्थ तत्त्व का न जानना यह मन का विकार है है और संसार के सब दुःखों का कारण है ॥ ८ ॥ विंशतिः क्रिमिजातय इति यूकाः पिपीलिकाश्चेति द्विविधा बहिर्म- लजाः, केशादाः लोमादा लोमद्वीपाः सौरसा औदुम्बरा जन्तुमातरश्चेति षट्शोणितजाः, अन्त्रादा उदरादा हृदयदराश्चुरवो दर्भपुष्पाः सौगन्धिका महागुदाश्चेति सप्त कफजाः, ककेरुका मकेरुका लेलिहाः सशूल्काः सौसुरादाश्चेति पञ्च पुरीषजा इति विंशतिः क्रिमिजातयः । विंशतिः प्रमेहा इति उदकमेहश्चेक्षुरसमेहश्च सान्द्रमेहश्च सान्द्रप्रसादमेहश्च शुक्क्रमेहश्च शुक्रमेहश्च शीतमेहश्च शनैर्मेहश्च सिकतामेहश्च लालामेह- श्वेति दश श्लेष्मनिमित्ताः, क्षारमेहश्च कालमेहश्च नीलमेहश्च लोहि- तमेहश्च माञ्जिष्ठामेहश्च हरिद्रामेहश्चेति षट् पित्तनिमित्ताः, वसामेहश्च मज्जमेहश्च हस्तिमेहश्च मधुमेहश्चेति चत्वारो वातनिमित्ता इति विंशतिः प्रमेहाः । विंशतिर्योनिव्यापद इति वातिकी पैत्तिकी श्लैष्मिकी सान्निपातिकी चेति चतस्रः, दोष-दूष्य-संसर्ग-प्रकृति-निर्देशैरवशिष्टाः षोडश निर्दिश्यन्ते, तद्यथा—रक्तयोनिश्चारजस्का चाचरणा चातिच- रणा च प्राक्चरणा चोपप्लुता चोदावर्तिनी च कर्णिनी च पुत्रघ्नी चान्त- र्मुखी च सूचीमुखी च शुष्का च वामिनी च षण्डयोनिश्च महायोनि- श्चेति विंशतिर्योनिव्यापदः । केवलश्चायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्ट इति ॥ ४ ॥ कृमियों की जातियां बीस प्रकार की हैं, यथा—यूक ( जूं ) और पिपीलि- काएं ( ढोग ) ये दो प्रकार के कृमि बाह्य मल ( पसीने आदि ) से उत्पन्न होते हैं । केशाद लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औदुम्बर और जन्तुमाता ये छः रक्तजन्य, अन्त्राद, उदराद, हृदयचर, चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक, महागुद ये सात कफजन्य, कके रुक, लेलिह, सशूलक, और सोसुराद ये पांच पुरीषजन्य हैं । ये बीस प्रकार के कमि हैं ।