चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुष्कता, स्वाद का ज्ञान न होना, गन्धज्ञान का अभाव, घ्राणशक्ति का अभाव, घ्राणशक्ति का नाश होना, कान में वेदना, शब्द का सुनाई न देना, ऊंचा सुनाई देना, बहरापन, पलकों का स्तम्भ, पलकों का संकुचित होना, शंख, कनपटी का फटना, माथे का फटना, शिरोवेदना, बालों की भूमि का फटना, अर्दित वात, एकांग रोग, सर्वांग रोग, पक्षवध (पक्षाघात) आक्षेपक, दण्डपतानक, थकान, चक्कर आना, कम्पन, जम्भाई, विषाद, चिन्ता, बहुत प्रलाप, ग्लानि, रूक्षता, कर्कशता, लाल-लाल रङ्ग की चमक, नींद का न आना, तिमिर (काच रोग), आँख में वेदना, आंख का पलटना, भुवों का संकुचित होना और चित्त की अनवस्थितता, चंचलता (अस्थिरता) ये अस्सी वात विकार हैं। वात विकार असंख्य हैं—यहाँ पर प्रधान प्रधान वात रोगों की गणना की है ॥ ११ ॥ सर्वेष्वपि खल्वेतेषु वातविकारेषूक्तेष्वन्येषु चानुक्तेषु वायोरिद- मात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसंदेहा वातविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा—रौक्ष्यं लाघवं वैशद्यं शैत्यं गतिरमूर्तत्वं चेति वायोरात्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा— स्रंस-भ्रंश-व्यासङ्ग-भेद-साद-हर्ष-तर्ष-वर्त-मर्द-कम्प-चाल-तोद-व्यथा-चे- ष्टादीनि, तथा खर-परुष-विशद-सुषिर तारुण-कषाय-विरस-मुखशोष- शूल-सुप्ति-संकोचन-स्तम्भन-खञ्जनादीनि च वायोः कर्माणि, तैरन्वितं वातविकारमेवाध्यवस्येत् ॥ १२ ॥ तं मधुराम्ल-लवण-स्निग्धोष्णैरुपक्रमेत स्नेहस्वेदास्थापनानुवास- ननस्तःकर्मभोजनाभ्यङ्गोत्सादन-परिषेकादिभिर्वातहरेर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य; आस्थापनमनुवासनं तु खलु सर्वोपक्रमेभ्यो वाते प्रधान- तमं मन्यन्ते भिषजः, तद्ध्यादित एव पक्वाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं वातमूलं छिनत्ति, तत्रावजिते वातेऽपि शरीरान्तर्गता वात- विकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथा वनस्पतेर्मूले छिन्ने स्कन्धशाखावरोह- कुसुमफलपलाशादीनां नियतो विनाशस्तद्वत् ॥ १३ ॥ इन सब यहां पर कहे या न कहे हुए वातविकारों में वायु के अपने स्वाभाविक (अन्य उपाधि से न हुए) कर्मों से, तथा अपने लक्षणों से वायु को पहिचान कर वात के एक भाग को देखकर सन्देह रहित होकर कुशल चिकित्सक बात रोग ही है ऐसा पहिचानते हैं। वे ये हैं यथा-रूक्षता, लघुता