भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 261

अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४३ की अधिकता, पसीने का अधिक आना, अंगों (बगल आदि) में पसीना आना, अंगों से दुर्गन्ध आना, अंगों का फटना, रक्त में क्लिन्नता ( बदबू ) आना, मांस की क्लिन्नता, त्वचा का जलना, मांस की जलन, त्वचा और मांस का फटना, त्वचा के ऊपर के चर्म का फटना, लाल-लाल फुन्सियां (बर्रे के काटे के समान ), रक्तपित्त (रक्तस्राव ), लाल-लाल धब्बे चकत्ते, हरा रंग हल्दी का सा पीला रंग, नीलिका (झाई ), कक्ष्या ( बगल का मांस फटना ), कामला मुख की कटुता, मुख से दुर्गन्ध आना, प्यास का अधिक लगना, भोजन में अतृप्ति, मुख का पकना, गले का पकना, आंख का पकना, गुदा का पकना शिश्न का पकना, प्राणों का नाश, और आंखों के सामने अन्धेरा रहना, मल- मूत्र और आंख का हरा या पीला होना, ये चालीस पित्तजन्य रोग हैं। पित्त विकार असंख्य हैं, यहां पर मुख्य रोगों की गणना की गई है ॥ १४ ॥ सर्वेष्वपि खल्वेतेषु पित्तविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु पित्तस्येदमात्मरूप- मपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसंदेहाः पित्तविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः । तद्यथा-औष्ण्यं तैक्ष्ण्यं लाघवम- नतिस्नेहो वर्णश्च शुक्लारुणवर्जो गन्धश्च विस्रो रसौ च कटुकाम्लौ पित्तस्याऽऽत्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति । तं तं शरीरावयवमाविशतः । तद्यथा-दाहौष्ण्यपाक-स्वेद-क्लेद-कोथ- स्राव-रागा यथास्वं च गन्ध-वर्ण-रसाभिनिर्वर्तनं पित्तस्य कर्माणि, तैरन्वितं पित्तविकारमेवाध्यवस्येत् ॥ १५ ॥ तं मधुर-तिक्त-कषाय-शीतैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्नेह-विरेचन-प्रदेह-परि- षेकाभ्यङ्गावगाहादिभिः पित्तहरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य, विरेचनं तु सर्वोपक्रमेभ्यः पित्ते प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्ध्यादित एवाऽऽ- माशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं पित्तमूलं चापकर्षति, तत्रावजिते पित्तेऽपि शरीरान्तर्गताः पित्तविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथाऽग्नौ व्य- पोढे केवलमग्निगृहं शीतीभवति तद्वत् ॥ १६ ॥ इन सब यहां कहे या नहीं कहे हुए पित्त विकारों को या उसके एक भाग को स्वाभाविक रूप से ( किसी दूसरे दोष से न मिला होने पर ), कार्यों, एवं पित्त के लक्षणों से पहिचानकर कुशल वैद्य लोग पित्त रोग ही है, ऐसा निश्चय करते हैं। यथा गरमी, तीक्ष्णता, लघुता, चिकनास की अधिकता न होना, सफेद और काले-लाल रंग को छोड़कर अन्यरंग, सड़ान्द (दुर्गन्ध युक्त ) कटु और खट्टा रस होना ये पित्त के लक्षण हैं। निम्न प्रकार के कर्मों से पित्त की पहिचान होती है शरीर के जिस जिस अवयव में पित्त आश्रय लेता है, वहां कह

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान) · पृष्ठ 261, कुल 639 में से · BharatKosha