भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 639 में से

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पर दाह, गरमी, पाक ( पकना ), पसीना, क्लिन्नता, सडांद, खज, स्राव, रंग तथा पित्त के समान गन्ध, वर्ण और रस की उत्पत्ति होना ये पित्त के कर्म हैं । इन कार्यों से युक्त रोग को पित्त का विकार जानना चाहिये । इस पित्त को शान्त करने के लिए मधुर, तिक्त, कषाय, शीत उपक्रमों से चिकित्सा करनी चाहिये । पित्त नाशक स्नेह, विरेचन, प्रदेह, स्नान, मर्दन आदि कार्यों को मात्रा एवं समय को देखकर प्रयोग करना चाहिये । पित्त को शान्त करने के लिए वैद्य लोग विरेचन को ही सब से मुख्य साधन मानते हैं । यह जल्दी ही आमाशय में प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण पित्तविकार को जड़ से बाहर निकाल देता है । ऐसी अवस्था में पित्त के सम्पूर्ण शान्त न होने पर भी शरीरस्थ पित्तरोग ऐसे ही शान्त हो जाते हैं जिस प्रकार की भट्टी से आग निकाल लेने पर भट्टी अपने आप ठण्डी हो जाती है ॥ १६ ॥ श्लेष्मविकारांश्च विंशतिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः, तद्यथा- तृप्तिश्च, तन्द्रा च, निद्राया आधिक्यं च, स्तैमित्यं च, गुरुगात्रता च, आलस्यं च, मुखमाधुर्यं च, मुखस्रावश्च, श्लेष्मोद्गिरणं च, मलस्याऽऽ- धिक्यं च, कण्ठोपलेपश्च, बलासश्च हृदयोपलेपश्च, धमनी-प्रतिचयश्च, गलगण्डश्च, अतिस्थौल्यं च, शीताग्निता च, उददर्दश्च, श्वेतावभासता च, श्वेत-मूत्र-नेत्र-वर्चस्त्वं चेति विंशतिः श्लेष्मविकाराः श्लेष्मविका- राणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥१७॥ कफजन्यरोग बीस हैं । उन का कहते हैं यथा-भोजन न करने पर भी तृप्ति का अनुभव, तन्द्रा, नींद का अधिक आना, स्तैमित्य ( शरीर का गीले वस्त्र से ढंपा प्रतीत होना ), शरीर का भारीपन, आलस्य आना, मुख की मिठास, मुख से लाला बहना, कफ का वमन, शरीर से मल का अधिक निक- लना, कफ का क्षय, हृदय का भरा रहना, कण्ठ का भरा रहना, धमनियों का अवरोध, गलगण्ड, अतिस्थूल, मन्दाग्नि, उददर्द ( छपाकी ), श्वेत रंग की प्रतीति, मूत्र मल और नेत्र में सफेदी, ये बीस कफजन्य रोग हैं । कफजन्य विकार असंख्य हैं, परन्तु यहां पर प्रधान रोगों की गणना की है ॥१७॥ सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु श्लेष्मविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु श्लेष्मण इद- मात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमु- क्तसंदेहाः श्लेष्मविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा-श्वैत्य-शैत्य- स्नेह-गौरव-माधुर्य-मात्स्न्यानि श्लेष्मण आत्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा- श्वैत्य-शैत्य-कण्डू-स्थैर्य-गौरव-स्नेह-स्तम्भ-सुप्ति-क्लेदोपदेह-बन्ध-माधुर्य-