भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २५५ शरीर का विरेचन, शिरो-विरेचन, बमन, भय, चिन्ता, क्रोध, कहानी सुनना, मैथुन रक्त मोक्षण (शिरावेध), उपवास, दुःखदायक बिस्तर, सत्त्व गुण की अधिकता, तमोगुण का जय (योगाभ्यास से होती है), ये कारण नींद को नहीं आने देते। इसलिए अहित, अवाञ्छनीय नींद को रोकने के लिये स्वस्थ पुरुष को इन्हें बर्तना चाहिये ॥५५-५६॥ एत एव च विज्ञेया निद्रानाशस्य हेतवः । कार्यं कालो विकारश्च प्रकृतिर्वायुरेव च ॥ ५७ ॥ निद्रानाश के दूसरे कारण—कार्य में फंसा रहना, काल (बुढ़ापा), विकार, शूल दर्द होना, स्वभाव से ही नींद कम आना, वायु, उन्माद रोग या वातरोग आदि निद्रानाश के कारण हैं ॥ ५७ ॥ तमोभवा श्लेष्मसमुद्भवा च मनः-शरीरश्रम-संभवा च । आगन्तुकी व्याध्यनुवर्तिनी च रात्रिस्वभाव-प्रभवा च निद्रा ॥५८॥ रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधात्रीं प्रवदन्ति निद्राम् । तमोभवामाहुरघस्य मूलं शेषं पुनर्व्याधिषु निर्दिशन्ति ॥५९॥ नींद छः प्रकार की हैं यथा—तमोजन्या, निद्रा कफ से उत्पन्न मन और शरीर के थकने से 'आगन्तुकी रोग (सन्निपात ज्वर आदि) उत्पन्न होने वाली रात्रि के स्वभाव के कारण उत्पन्न होने वाली निद्रा । इन छः प्रकार की निद्रा में जो निद्रा रात्रि-स्वभाव के कारण उत्पन्न होती है उसको भूतधात्री अर्थात् धाय के समान प्राणियों को पोषण करने वाली कहते हैं, और तमोगुण से उत्पन्न निद्रा पाप अधर्म का मूल है, शेष निद्राओं की गिनती रोगों में की जाती है । तत्र श्लोकाः—निन्दिताः पुरुषास्तेषां यौ विशेषेण निन्दितौ । निन्दिते कारणं दोषास्तयोर्निन्दितभेषजम् ॥ ६० ॥ येभ्यो यदा हिता निद्रा येभ्यश्चाप्यहिता यदा । अतिनिद्रानिद्रयोश्च भेषजं यद्गुणा च सा ॥ ६१ ॥ या या यथाप्रभावा च निद्रा तत्सर्वमत्रिजः । अष्टौनिन्दितसंख्याते व्याजहार पुनर्वसुः ॥६२॥ निन्दित पुरुष, इनमें जो दो (स्थूल और कृश) अधिक निन्दित, निन्दित होने का का कारण, दोनों के दोष, औषध, जिनके लिये निद्रा हितकारी है, जिनके लिये अहितकारी, अति नींद और नींद के न आने की औषध और जिस कारण से नींद आती है, जिसजिस प्रकार से उत्पन्न होती है, इन सब बातों को आत्रेय ऋषि ने 'अष्टौ निन्दित' नामक अध्यायमें कह दिया ॥६०-६२॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के अष्टौनिन्दितीयो नाम एकविंशतितमोऽध्यायः ॥२१॥

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