चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ
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अ० २२ ] १७ सूत्रस्थानम् २५७
स्नेहनं स्नेह-विष्यन्द-मार्दव-क्लेद-कारकम् ॥ १० ॥
स्तम्भ-गौरव-शीतघ्नं स्वेदनं स्वेदकारकम् ।
स्तम्भनं स्तम्भयति यद्गतिमन्तं चलं द्रवम् ॥ ११ ॥
अग्निवेश के वचन को सुनकर गुरु बोले; शरीर के अन्दर जो वस्तु लघुता
हलकापन, उत्पन्न करती है, उसको 'लंघन' कहते हैं। जो वस्तु शरीर में
स्थूलता उत्पन्न करती है, उसे 'बृंहण' कहते हैं। जो वस्तु शरीर में रूखता,
कर्कशता और विशदता, पृथक्त्व उत्पन्न करती है, वह रूक्षण है। शरीर में
जो वस्तु विकास, विष्यन्द, बिलयन, कोमलता और क्लिन्नता उत्पन्न करती है,
वह स्नेहन है, जो वस्तु शरीर में जड़ता उत्पन्न करे, भारीपन करे शीत का
नाश करे तथा पसीना लाये वह 'स्वेदन' है। जो वस्तु गतिशील, थोड़ी सी
गति को, द्रव को, रोक देती है, वह स्तम्भन है ॥ ८-११ ॥
लघूष्णतीक्ष्णविशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं सरम् ।
कठिनं चैव यद् द्रव्यं प्रायस्तल्लङ्घनं स्मृतम् ॥ १२ ॥
गुरुशीतमृदुस्निग्धं बहलं स्थूलपिच्छिलम् ।
प्रायो मन्दं स्थिरं श्लक्ष्णं द्रव्यं बृंहणमुच्यते ॥ १३ ॥
रूक्षं लघु खरं तीक्ष्णमुष्णं स्थिरमपिच्छिलम् ।
प्रायशः कठिनं चैव यद् द्रव्यं तद्धि रूक्षणम् ॥ १४ ॥
द्रवं सूक्ष्मं सरं स्निग्धं पिच्छिलं गुरु शीतलम् ।
प्रायो मन्दं मृदु च यद् द्रव्यं तत्स्नेहनं मतम् ॥ १५ ॥
उष्णं तीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।
द्रव्यं गुरु च यत् प्रायस्तद्धि स्वेदनमुच्यते ॥ १६ ॥
शीतं मन्दं मृदु श्लक्ष्णं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।
यद् द्रव्यं लघु चोद्दिष्टं प्रायस्तत्स्तम्भनं स्मृतम् ॥ १७ ॥
जो वस्तु लघु, गरम, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर (कर्कश), सर
(बहने वाला) और कठिन हो वह वस्तु प्रायः करके 'लंघन' गुण वाली होती
है। भारी, शीतवीर्य, मृदु, स्निग्ध, घन, स्थूल पिच्छिल, चिरकारी, (देर में कार्य
करने वाला) स्थिर, चिकना जो पदार्थ होता है, वह प्रायः करके 'बृंहण' होता
है। रूक्ष, लघु, खर, तीक्ष्ण; उष्ण, स्थिर, विकास रहित और कठिन द्रव्य है
वह प्रायः करके 'रूक्षण' होता है। * जो द्रव्य पतला, सूक्ष्म, बहने वाला,
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* रूक्षण में मुख्य रूप से स्नेह का अभाव रहता है और लंघन में गौरव
का अभाव रहता है यह दोनों में मुख्य भेद है।