भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 298

एवंवादिनं च भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—भगवन्! नत्वे- तदेवमुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति ॥ ३४ ॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—येषां विदितमाहारतत्वमग्निवेश! गुणतो द्रव्यतः कर्मतः सर्वावयवतश्च मात्रादयो भावाः, त एतदेवमुपदिष्टं विज्ञातुमुत्सहन्ते। यथा तु खल्वेतदुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति, तथैतदुपदेक्ष्यामो मात्रादीन् भावानुदाहरन्तः। तेषां हि बहुविधविकल्पा भवन्ति। आहारविधिविशेषांस्तु खलु लक्ष- णतश्चावयवतश्चानुव्याख्यास्यामः॥ ३५॥ तद्यथा—आहारत्वमाहारस्यैकविधमर्थभेदात्; स पुनर्द्वियोनिः, स्थावरजङ्गमात्मकत्वात्; द्विविधप्रभावो हिताहितोदर्कविशेषात्; चतुर्विधोपयोगः पानाशन-भक्ष्य-लेह्योपयोगात्; षडास्वादो रसभेदतः षड्विधत्वात्; विंशतिगुणो गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मन्द-तीक्ष्ण- स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल-श्लक्ष्ण-खर-सूक्ष्म-स्थूल-सान्द्र- द्रवा-नुगमात्; अपरिसंख्येयविकल्पो द्रव्य-संयोग-करण-बाहुल्यात् ॥ ३६॥ इस प्रकार कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश बोले—इतना कह देने से सब वैद्य सब बातों को नहीं समझ सकेंगे। अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—कि जिन वैद्यों को आहारयोग्य पदार्थ गुण, (गुरु लघु आदि) कारण (यह आप्य है, यह आग्नेय है इत्यादि), कर्म (यह जीवनीय, यह बृंहणीय इत्यादि) सब अवयव २ (रस, वीर्य, विपाक प्रभाव से), मात्रा एवं पुरुष की अवस्था का ज्ञान होगा वे ही इतने (ऊपर कहे हुए) उपदेश से समझ सकते हैं। जिस प्रकार कहने से सब वैद्य सम्पूर्ण रूप में जान सकेंगे, उसी प्रकार से मात्रा आदि वस्तुओं को उदाहरण के साथ कहेंगे। इनके बहुत से भेद होते हैं। आहार की जो विशिष्ट विधि है, उसको प्रथम साधारण रूप में कहकर फिर विभाग पूर्वक कहेंगे। यथा—आहारत्व (खाद्यत्व) गुण समान होने से सम्पूर्ण आहार एक प्रकार का है, क्योंकि अर्थ में कोई भेद नहीं है। इस आहार के दो उत्पत्ति स्थान हैं, स्थावर और जंगम। इस आहार के दो प्रकार के प्रभाव हैं, एक हितफलजनक और दूसरा अहितफलजनक। इस आहार का चार प्रकार से उपयोग होता है। यथा—पान (पीना), अशन (दांतों से काटकर खाना), भक्ष्य (चबाना) और लेह्य (चाटने) के उपयोग से। इस आहार के छः स्वाद होने से यह रस भेद से छः प्रकार का है, क्योंकि रस छः प्रकार के हैं। इस आहार के गुण बीस प्रकार के हैं। यथा—गुरु, लघु,