चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८६ चरकसंहिता [अ० २५ वाली वस्तुओं में नागरमोथा; निर्वापण (दाह को कम करनेवाली) दीपन, पाचन, वमन, अतिसार को नष्ट करनेवाली वस्तुओं में नेत्रबाला; संग्राहक, पाचन और दीपनीय वस्तुओं में टेटू (स्योनाक); संग्राहक, रक्त पित्तनाशक वस्तुओं में सारिवा; संग्राहक, दीपनीय, वात-कफ-रक्त और विबन्धनाशक वस्तुओं में गिलोय, संग्राहक, दीपन, वात कफनाशक वस्तुओं में बेलगिरी; दीपन, पाचन, संग्राहक सर्वदोषनाशकों में अतीस; संग्राहक, रक्त-पित्तनाशक वस्तुओं में नील कमल; कमल श्वेत, पद्म का केशर (कमल केशर); पित्त- कफनाशक वस्तुओं में धमासा; रक्त-पित्त के अतियोग को कम करने वाली वस्तुओं में गन्धप्रियंगू (घेउला); कफ-पित्त-रक्त संग्राहक, शुष्क करने वाली वस्तुओं में कुड़े की छाल, रक्तसंग्राहक, रक्त-पित्तनाशक-वस्तुओं में गम्भारी का फल; संग्राहक, वातनाशक, दीपनीय और शुक्रवर्धक वस्तुओं में पृश्निपर्णी; वृष्य और सर्वदोषनाशक वस्तुओं में विदारीकन्द, संग्राहक, बलकारक, वातनाशक वस्तुओं में बला (खरैंटी); मूत्रकृच्छ्र, वायुनाशक वस्तुओं में गोखरू; छेदनीय, दीपनीय, आनुलोमिक (वायु मल-मूत्र का अनुलोमन करने वाले), वात- कफनाशक वस्तुओं में अम्लवेतस; मलनिःसारक, पाचनीय अर्शनाशक वस्तुओं में यवक्षार; ग्रहणी-दोष, अर्श, घृतजन्य रोगों की शान्ति के लिये तक्र का अभ्यास अर्थात् सतत सेवन; ग्रहणी रोग, शोष, अर्श नाशक वस्तुओं में व्याघ्र आदि मांस खाने वाले पशुओं का मांस; रसायनों में दूध और घी का सततसेवन; उदावर्त्तनाशक और वृष्यकारक वस्तुओं में बराबर घी और सत्तू को खाना; दांतों को बल और रुचि, चमक, कान्ति पैदा करने की वस्तुओं में तैल के कोगले करना; दाह जलन को शान्त करने लिये चन्दन और गूलर का लेप; शीत को दूर करने वाले लेपों में चन्दन और अगर का लेप; जलन में त्वग्-रोग, पसीने को दूर करने वाले लेपों में कत्तृण और खस का लेप, वातनाशक मर्दन और लेप के प्रयोग में कूठ; आंखों के लिये हितकारी, वृष्य केश्य, कण्ठ के हितकारी वर्ण, बल और विरजनीय (रंग पैदा करने) और रोपण करने वाली वस्तुओं में मुलैहठी; प्राण या जीवन देने वाली वस्तुओं में वायु; आमविकार, मल मूत्रादि का अवरोध, ठण्ड, शूल, कम्पन को दूर करने के लिए आग का सेक; स्तम्भक पदार्थों में जल; प्यास की अधिकता को कम करने के लिये मिट्टी के ढेले या पत्थर को खूब गरम करके बुझाया हुआ पानी पिलाना; आम रोग को करने वाले कारणों में बहुत अधिक खाना; अग्निवर्धक वस्तुओं में जाठराग्नि के बलानुसार खाना; सेव्य, उपयोगी वस्तुओं में अपनी