चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुण्डरीक-शतपत्र-मधूक-प्रियङ्गु-धातकीपुष्पैर्दश पुष्पाप्तवा भवन्ति । इक्षु- काण्डेक्ष्विक्षुबालिका-पुण्ड्रक-चतुर्थाः काण्डाप्तवा भवन्ति । पटोल-ता- डपत्रासवौ द्वौ भवतः । तिल्वक-लोध्रैलबालुक-क्रमुक-चतुर्थास्त्वगासवा भवन्ति, शर्करासब एक एवेति । एवमेषामासवानां चतुरशीतिः परस्प- रेणासंस्पृष्टानामासवद्रव्याणामुपनिर्दिष्टा भवति । एषामासवानामासु- तत्त्वादासकसंज्ञा । द्रव्य-संयोग-विभागस्त्वेषां बहुविकल्पः संस्कारश्च । यथास्वं योनिसंस्कारसंस्कृताश्चाऽऽसवाः स्वकर्म कुर्वन्ति । संयोग- संस्कार-देश-काल-स्थापन-मात्रादयश्च भावास्तेषां तेषामासवानां ते ते समुपदिश्यन्ते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्येति ॥ ४७ ॥ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! संक्षेप से उन सब के उत्पत्ति स्थान ६ ( नौ ) हैं । यथा— धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र, त्वचा, (छाल) और शर्करा । इन्हीं में द्रव्यसंयोग (मिश्रण), करण (संस्कार) द्वारा असंख्येय आसव बन जाते हैं । इनमें अधिक हितकारी (मुख्य) आसव २४ ( चौबीस ) हैं । उनको कहते हैं— सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मैरेय और मेदक और धान्याम्ल—ये छः धान्या- म्बुक (कांजी) आसव होते हैं १ । द्राक्षा, खजूर, गम्भारी, धान्वन, राजादन (खिरनी), तृणशून्य (केतकी), परूषक (फालसा), अभया (हरड़), आमलक (आंवला), मृगलिण्डिका (बहेड़ा ?), जाम्भव (जामुन), कपित्थ (कैथ), कुवल (बड़ा बेर), बदर (छोटा बेर), कर्कन्धु (झाड़ी का बेर), पीलु, पियालु (प्याल), पनस (कटहल), न्यग्रोध (बड़), अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष (पिलखन), कपीतन, उदुम्बर (गूलर), अजमोद (अजवायन), शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), और शंखिनी, ये छब्बीस फलासव हैं । विदारीगन्धा (शालपर्णी), अश्वगन्धा (असगन्ध), कृष्णागन्धा (शोभाञ्जन), शतावरी, निशोथ, जमाल गोटा, द्रवन्ती (मुगलई ऐरण्ड), बेलगिरी, एरण्डमूल, चीतामूल, ये ग्यारह मूलासव हैं । बड़ासाल, अश्वकर्ण (साल भाग), चन्दन, तीनस, खैर, सफेद खैर, सलवन, अर्जुन, असन, अरिमेद (विट् खदिर), तिन्दुक, किणिही (अपामार्ग), शमी (जंड), शुक्ति (बेर), शीशम, सिरस, अशोक, | धान्वन और मुलेहठी ये बीस 'सारासव' है । पद्म (लाल आठ पत्तों वाला), उत्पल (नील कमल), कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, (श्वेत कमल), शतपत्र_
१. सौवीरं निष्तुषयवकृतम्, मैरेयं सुरासवकृता सुरा, मेदकः श्वेतसुर जगलाख्या, धान्याम्बु (काञ्जि) ।