भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २६१ कमल, मधूक ( महुवे के फूल ), प्रियंगु, धाय के पुष्प, ये दस 'पुष्पासव' हैं । गन्ना, इक्षुवालिका ( गन्ने के ऊपर का भाग ), गन्ने की जड़, पौण्डा ये चार 'काण्डासव' हैं । परवल और ताड़ के पत्ते ये दो 'पत्रासव' होते हैं । तिल्वक ( शाबर लोध ), लोध ( पठानी लोध ), एलवालुक, क्रमुक ये चार 'त्वगासव' हैं । शर्करासव एक ही है । इस प्रकार एक एक द्रव्य से बनने वाले ये ८४ ( चौरासी ) आसव हैं । आसुत अर्थात् सत के खिंच जाने से इन को 'आसव' कहते हैं । द्रव्यों के संयोग और विभाग से ये बहुत प्रकार के और असंख्य बन जाते हैं । आसव अपने संयोग तथा संस्कार के अनुसार अपना कार्य करते हैं । संयोगसंस्कार से अभिप्राय देश ( भस्मराशि, धान्यराशि ), काल ( पन्द्रह दिन, एक मास ), स्थापन ( सन्धान ), मात्रा आदि ( द्रव्यस्वभाव ) से है । कार्य की अपेक्षा से ही आसवों के संयोग संस्कार रूपी कार्य किये जाते हैं ॥ ४७ ॥ भवति चात्र-मनःशरीराग्नि-बल-प्रदानाम्स्वप्न-शोकारुचि-नाशनानाम् । संहर्षणानां प्रवरासवानांमशीतिरुक्ता चतुरुत्तरैषा ॥ ४८ ॥ तत्र श्लोकः— शरीररोगप्रकृतौ मतानि तत्त्वेन चाऽऽहारविनिश्चयो यः । उवाच यज्जःपुरुषादिकेऽस्मिन्मुनिस्तथाऽग्र्याणि वरासवांश्च ॥ ४९ ॥ मन, शरीर, अग्नि को बल देनेवाले, नींद न आना, शोक और अरुचि को मिटाने वाले, मन में प्रसन्नता करने वाले ये उत्तम ( श्रेष्ठ ) ८४ आसव कह दिये । शरीर एवं रोगों की उत्पत्ति, ऋषियों के मत, आहार की हिताहित-विधि का अन्तिम सार, पथ्यापथ्य और श्रेष्ठ आसव इस अध्याय में कह दिये हैं। इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अन्नपानचतुष्के यज्जःपुरुषीयोऽध्यायः पञ्चविंशतितमः समाप्तः ॥ ————— षड्विंशोऽध्यायः । ————— अथात आत्रेयभद्रकाप्यीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'भद्रकाप्यीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥