चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished639 pages
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अ० २७] सूत्रस्थानम् ३४३
पियालमज्जा सदृशं विद्यादौष्ण्यं विना गुणैः ।
श्लेष्मलं मधुरं शीतं श्लेष्मातकफलं गुरु ॥ १५७ ॥
श्लेष्मलं गुरु विष्टम्भि चाक्षोटफलमग्निजित् ।
गुरूष्णं मधुरं रूक्षं१ केशघ्नं च शमीफलम् ॥ १५८ ॥
विष्टम्भयति कारञ्जं पित्तश्लेष्माविरोधि च ।
आम्रातकं दन्तशठमम्लं सकरमर्दकम् ॥ १५९ ॥
रक्तपित्तकरं विद्यादैरावतकमैव च ।
वातघ्नं दीपनं चैव वार्त्ताकं कटुतिक्तकम् ॥ १६० ॥
वातलं कफपित्तघ्नं विद्यात्पर्यटकीफलम् ।
पित्तश्लेष्मघ्नमम्लं च वातलं चाक्षिकीफलम् ॥ १६१ ॥
मधुराण्यनुपाकीनि वातपित्तहराणि च ।
अश्वत्थोदुम्बर-प्लक्ष-न्यग्रोधानां फलानि च ॥ १६२ ॥
कषायमधुराम्लानि वातलानि गुरूणि च ।
भल्लातकास्थ्यग्निसमं त्वङ्मांसं स्वादु शीतलम् ।
पञ्चमः फलवर्गोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः ॥ १६३ ॥
फलवर्ग—पकी हुई किशमिश प्यास, जलन, ज्वर, श्वास, रक्त-पित्त, उरः-
क्षत, क्षय, वातपित्त, उदावर्त्त, स्वरभेद, मदात्यय, मुख की कटुता मुखशोष और
और कास को शीघ्र नष्ट करती है। यह बृंहणी पुष्टिकारक, वृष्य, मधुर, स्निग्ध
शीतल है। खजूर-मधुर, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, गुरु शीतल, क्षय, चोट लगने,
जलन और वात-पित्त रोग में हितकारी है। फल्गु (अंजीर), तृप्तिकारक,
बृंहण, गुरु, विष्टम्भी और शीतल है। फालसा और महुआ वात-पित्त रोग में
उत्तम है। आम्रात (आमड़ा) मधुर, पुष्टिकारक, बलकारक, तृप्तिकारक,
गुरु, स्निग्ध, कफकारक, शीतल, वृष्य और पेट में अफारा करता है। तालके
फल (ताड़फल) और पका हुआ नारियल बृंहण, स्निग्ध, शीतल, बलकारक
और मधुर होते हैं।
भव्य (कमरख) मधुर, अम्ल-कषाय, विष्टम्भि, गुरु, शीतल, पित्तश्लेष्म-
कारक, स्तम्भक और मुख को शोधन करता है। खट्टा फालसा, द्राक्षा, झाड़ी के
बेर, आरुक (आडू या आलूबुखारा), ये पित्तकफ को कुपित करने वाले हैं।
इसी प्रकार बेर और लकुच (बढ़ो), भी पित्त-कफकारक है। आरुक (आलु-
बुखारा) बहुत गरम नहीं, स्वादुमधुर और खाने में स्वादिष्ट, बृंहण पुष्टिकारक,
१. 'शीतं' इति च पाठः ।