चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 385, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २७] सूत्रस्थानम् ३६७ कारक, अग्निवर्धक, हृद्य, आँखों के लिये हितकारी, अविदाही, त्रिदोषनाशक, कुछ मधुर और सब नमकों में श्रेष्ठ है। सौवर्चल नमक (संचल नमक)—सूक्ष्म, उष्ण, कटु होने से तथा सुगन्धि होने से रुचिदायक, विबन्धनाशक, हृद्य, उद्गार (डकार) को शोधन करने वाला है। विड (काला नमक)—तीक्ष्ण, उष्ण और व्यवायी (शरीर में फैलने वाला होने से) अग्निदीपक, शूलनाशक, एवं वायु को ऊपर या नीचे, अधोमार्ग दोनों से अनुलोमन करने वाला है। उद्भिद् नमक-तिक्त, कटु, क्षारयुक्त, तीक्ष्ण उत्क्लेदि अर्थात् वमन की रुचि करने वाला है। काले लवण के गुण संचल नमक के समान हैं, परन्तु इस में संचल के समान गन्ध नहीं होती। समुद्र के पानी से तैयार किया नमक मधुर है। पांशुज (सज्जी) जिससे धोबी कपड़ा धोते हैं, ऐसी मिट्टी से तैयार किया नमक कटु और तिक्त होता है। सब प्रकार के नमक रुचिकारक, अन्न या व्रण को पकाने वाले; संस्री और वात- नाशक हैं। जौ-क्षार—हृदय, पाण्डु, ग्रहणी रोग, प्लीहा, आनाह, गलरोग, कफजन्य कास और अर्शरोग को नष्ट करते हैं। सब प्रकार के क्षार (टंकण, सज्जी, पापड़ खार आदि) तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, रूक्ष, क्लेदि, अन्न और व्रण को पकाने वाले, पके हुए व्रण को फाड़ने वाले, जलाने वाले, अग्निवर्द्धक, कफ आदि का छेदन करने वाले अग्नि के समान गुण वाले (उष्ण) होते हैं। कारवी (काला जीरा,) कुंचीका (मोटा जीरा) ये रुचिकर अग्नि-दीपक, वात, कफ, दुर्गन्ध को नाश करने वाले हैं। खान पान में किन किन द्रव्यों का व्यवहार होता है या होना चाहिये इसका निश्चय करना कठिन है, कोई एक नियम नहीं बन सकता, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की रुचि भिन्न भिन्न है। यह बारहवां आहारयोगी द्रव्यों का वर्ग भी समाप्त हुआ ॥ २४४-३०६ ॥ इत्याहारयोगिवर्गः । शूकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते । पुराणं प्रायशो रूक्षं प्रायेणाभिनवं गुरु ॥ ३०७ ॥ यद्यदागच्छति क्षिप्रं तत्तल्लघुतरं स्मृतम् । निस्तुषं युक्तिसृष्टं तु सुप्यं लघु विपच्यते ॥ ३०८ ॥ शूकधान्य (चावल, गेहूँ आदि), शमीधान्य (मूंग, मसूर, उड़द आदि) ये एक साल पुराने प्रशस्त हैं। प्रायः करके पुराने धान्य रूक्ष होते हैं।