भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० २७ ] २४ सूत्रस्थानम् [ ३४५ हरितानां यथाशाकं निर्देशः साध्वसाधुषु । मद्याम्बुगोरसादीनां स्वे स्वे वर्गे विनिश्चयः ॥ ३१६ ॥ त्याज्य शाक—कृमि, वात, धूप से मरा (सूखा), शुष्क, पुराना, ऋतु में उत्पन्न नहीं हुआ, और जो शाक बिना स्नेह (घी या तेल) के तैयार किया गया हो और जिसका कि भांप कर पानी न निकाल दिया गया हो, वह शाक त्याज्य है । जो फल पुराना, (बहुत पका), कच्चा, सड़ा, कृमि सर्प या हिंसक पशु से खाया हुआ हो, बर्फ या धूप से खराब हो, भले देश में उत्पन्न न हुआ, क्लिन्न (सड़ा) हो वह फल उत्तम नहीं। पकाने की विधि को छोड़कर हरित- वर्ग को शाकों की भांति समझना चाहिये । अर्थात् इनमें पानी का निचोड़ना, घी आदि में संस्कारित करना नहीं है। मद्य, जल, दूध आदि के अच्छे-बुरे का निश्चय इनके अपने अपने वर्ग में कर दिया है ॥ ३१४-३१६ ॥ यदाहारगुणैः पानं विपरीतं तदिष्यते । अन्नानुपानं धातूनां दृष्टं यन्न विरोधि च ॥ ३१७ ॥ आसवानां समुद्दिष्टा अशीतिश्चतुरोत्तरा । जलं पेयमपेयं च परीक्ष्यानुपिबेद्धितम् ॥ ३१८॥ स्निग्धोष्णं मारुते शस्तं पित्ते मधुरशीतलम् । कफेऽनुपानं रूक्षोष्णं, क्षये मांसरसः परम् ॥ ३१९ ॥ उपवासाध्व-भाष्य-स्त्री मारुतातप-कर्मभिः । श्रान्तानामनुपानार्थं पयः पथ्यं यथाऽमृतम् ॥ ३२० ॥ सुरा कृशानां पुष्ट्यर्थमनुपानं प्रशस्यते । कार्श्यार्थं स्थूलदेहानामनुशस्तं मधूदकम् ॥ ३२१ ॥ अल्पाग्नीनामनिद्राणां तन्द्रा-शोक-भय-क्लमैः । मद्यमांसाचितानां च मद्यमेवानुशस्यते ॥ ३२२॥ अथानुपानकर्म प्रवक्ष्यामि-अनुपानं तर्पयति, प्रीणयति, ऊर्जयति, पर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति, भुक्तमवसादयति, अन्नसंघातं भिनत्ति, मार्दव- मापायति, क्लेदयति, जरयति, सुखपरिणामितामाशुव्यवायितां चाऽऽ- हारस्योपजनयतीति ॥३२३॥ अनुपान—जो पेय पदार्थ आहार गुण के विपरीत (यथा-उष्ण आहार के पीछे शीत अनुपान*) तथा जो धातुओं का विरोधी न हो अपितु साम्य करने


  • अनु-पश्चात्-भोजनात् इत्यर्थः, पानं जलादिपानम् ।। दाह के पीछे मधुर, दूध वा खीर के पीछे कांजी (खट्टा) अनुपान न देवें, इसलिये कि धातुओं का विरोधी न हो ।