चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरके यानी अनुपान रूप में नहीं पीना चाहिये । इस अवस्था में पिया पानी कण्ठ, छाती ( आमाशय ) में स्थित आहारजन्य स्नेह को दूषित करके नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करता है । प्रायः उपयोग में आने वाले आहार, खान-पान का कुछ भाग यहाँ पर कह दिया है । खानपान के सब द्रव्यो का नाम से कथन करना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार की कोई भी औषध रहित वनस्पति नहीं, जिस प्रकार देश वाले उसे जैसा गुणकारी या हानि कारक कहते हों, उसके अनुसार यहां पर न कहे हुए द्रव्य को समझना चाहिये । गुणज्ञान के विषय में और भी कहते हैं ॥३२८॥ चरः शरीरावयवाः स्वभावो धातवः क्रिया । लिङ्गं प्रमाणं संस्कारो मात्राचात्र परीक्ष्यते ॥ ३२९ ॥ चरोऽनूप-जलाकाश-धन्वाद्यो भक्ष्यसंविधिः । जलजानूपजांश्चैव जलानूपचराश्च ये ॥ ३३० ॥ गुरुभक्ष्याश्च ये सत्त्वाः सर्वे ते गुरवः स्मृताः । लघुभक्ष्यास्तु लघवो धन्वजाधन्वचारिणः ॥ ३३१ ॥ शरीरावयवाः सक्थि-शिर-स्कन्धाद्यस्तथा । सक्थिमांसाद् गुरुः स्कन्धस्ततः क्रोडस्ततः शिरः ॥ ३३२ ॥ वृषणौ चर्ममेढ्रं च श्रोणी वृक्कौ यकृद् गुदम् । मांसाद् गुरुतरं विद्याद्यथास्वं मध्यमस्थि च ॥ ३३३ ॥ स्वभावाल्लघवौ मुद्गास्तथा लावकपिञ्जलाः । स्वभावाद् गुरवो माषा वराहमहिषास्तथा ॥ ३३४ ॥ धातूनां शोणिताद्यानां गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् । अलसेभ्यो विशिष्यन्ते प्राणिनो ये बहुक्रियाः ॥ ३३५ ॥ गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां स्त्रीणां च लाघवम् । महाप्रमाणा गुरवः स्वजातौ लघवोडन्यथा ॥ ३३६ ॥ चर ( जिस स्थान पर विचरता है ), शरीरावयव ( शरीर का अंग ), स्वभाव ( प्रकृति ), धातु ( रस, रक्तादि धातु ), क्रिया, लिंग, प्रमाण, संस्कार, मात्रा ये बातें गुरु लघु विचार करने में देखनी चाहिये । चर, गति रूपचर और भक्ष्य रूप चर भेद से दो प्रकार के हैं । इनमें गति रूप चर आनूप अर्थात् जलबहुल प्रदेश में विचरने वाले, आकाश में, धन्व देश में तथा जल आनूप दोनों देशों में विचरने वाले हैं । भक्ष्य रूप चर गुरु, शीतल पदार्थ